Archive | June, 2014

धर्म

15 Jun

–पंडित प्रशांत कुमार शर्मा जी के ब्लॉग ‘धर्म’ का हिंदी अनुवाद

–अनुवादिका: श्रीमती शान्ता देवी सिंह जी

 

आरम्भ करने से पहले, मैं सभी धर्म प्रेमियों से आग्रह करता हूँ कि आप मेरा मंतव्य मेरी वेबसाइट “Melbourne Arya” के “Statement of my beliefs” सेक्शन में देख लीजिये| मेरा उद्देश किसी का अपमान करना या नीचा दिखाना नहीं है, किंतु मैंने इस लेख के द्वारा धर्म के विषय को समझाने का प्रयास किया है| यदि इस लेख से किसी को दुःख पहुँचता है तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ|

प्रशन – धर्म क्या है?

उत्तर – मेरा यह मानना है कि धर्म जीने का वह रास्ता है जिससे सबकी भलाई, बुद्धि, सत्य (अति सत्य) ज्ञान, सम भाव, सदाचार और सभी परोपकारी गुणों द्वारा मानवता का उत्कर्ष करना और नाशकारी एवं बुरे गुणों का विरोध करना है|

 

अब महर्षि दयानन्द के शब्दों में धर्म की व्याख्या करते हैं:

o   “जो पक्षपातरहित, न्यायाचरण सत्यभाषण आदि युक्त ईश्वर आज्ञा, वेदों से अविरुद्ध है उस को ‘धर्म’ और जो पक्षपातसहित अन्यायाचरण, मिथ्याभाषण आदि ईश्वर आज्ञा भंग, वेद विरुद्ध है उस को अधर्म मानता हूँ|” — स्वमंतव्यामंतव्यप्रकाश:

o   “जिसका स्वरुप ईश्वर की आज्ञा का यथावत् पालन और पक्षपातरहित न्याय सर्वहित करना है, जो कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सुपरीक्षित और वेदोक्त होने से सब मनुष्यों के लिये यही एक मानना योग्य है उसको धर्म कहते हैं|” — अर्योद्देश्यरत्नमाला

o   “हे मनुष्य लोगों! जो पक्षपातरहित, न्याय, सत्याचरण से युक्त धर्म है, तुम लोग उसी को ग्रहण करो, उसके विपरीत कभी मत चलो, किंतु उसी की प्राप्ति के लिये विरोध को छोड़ के परस्पर सम्मति में रहो, जिससे तुम्हारा उत्तम सुख सब दिन बढता जाय और किसी प्रकार के दुःख न हो| तुम लोग विरुद्ध वाद छोड़ के परस्पर अर्थात् आपस में प्रीति के साथ पढना पढाना, प्रश्न उत्तर सहित संवाद करो, जिससे तुम्हारी सत्यविद्या नित्य बढती रहे|…….”  — ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदोक्तधर्मविषय: – ऋग्वेद (मंडल १०, सूक्त १९१, मंत्र २)

महर्षि कणाद वैशेषिक दर्शन (१:२) में कहते हैं “जिससे अभ्युदय (लौकिक कल्याण) और निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती, वह धर्म है|

महर्षि जैमिनि, मीमांसा दर्शन (१/१/२) में धर्म की परिभाषा देते हैं “प्रेरणा जिसका लक्षण – साधन एवं चिन्ह है, ऐसा बोधित विषय धर्म है|

 

आगे बढने से पहले चलिए हम उस प्रशन का उत्तर देने का प्रयास करें जो कई लोगों के मस्तिष्क में उभर रहा होगा.

प्रशन – मैं किस रिलिजन (मत) की ओर संकेत कर रहा हूँ?

उत्तर – मेरा संकेत ‘धर्म’ की ओर है न की किसी ‘मत’ (रिलिजन) की ओर| हम ऊपर धर्म की परिभाषा देख चुके हैं, आइये अब रिलिजन की परिभाषा देखें.

ऑक्सफ़ोर्ड (Oxford) शब्दकोष के अनुसार रिलिजन का अर्थ है:

मनुष्यों का किसी अलौकिक नियंत्रण शक्ति और व्यक्तिगत ईश्वर या ईश्वरों का आज्ञापालन और पूजा का अधिकारी होना, ऐसी पहचान का आचार और मानसिकता पर प्रभाव होना; किसी विशवास और पूजा प्रणाली.”

तुलना करने पर धर्म और मत की परिभाषा में बहुत समानता है, परन्तु दोनों पूर्णयता एक जैसे नहीं हैं| साधारणतया लोग धर्म शब्द से ही मत (रिलिजन) का ग्रहण करते हैं| लेकिन रिलिजन शब्द से धर्म की परिभाषा नहीं की जा सकती, क्योंकि धर्म तो पक्षपात रहित शिक्षा / कार्य है जिससे मानवता की वृद्धि होती है और वह किसी स्थान, जाती, मत, रंग, पंथ आदि से नहीं बंधा होता है| सच में तो धर्म पूरी मानवता के लिए है| धर्म वह है जो ऋषिओं (कृपया मेरी वेबसाइट के “Statement of my beliefs” सेक्शन में पॉइंट ४ देखिये) द्वारा प्रचार/प्रसार किया गया है; महर्षि ब्रम्हा से लेकर महर्षि दयानन्द पर्यन्त|ऋषिओं के प्रचार में कहीं भी विरोध नहीं है, जब तक की हम आचार्य सायण, महीधर, प्रोफेसर मैक्स मुलर, राल्फ टी. एच. ग्रिफित और इनके जैसे सामान्य मन वाले विद्वानों के गलत अनुवाद को नहीं पढते हैं| महर्षि दयानन्द का कहना था:

“जो कुछ भी अज्ञान से ओत-प्रोत मनुष्यों या वो जो की मत अनुयायियों द्वारा पथ भ्रष्ट किए जा चुके हैं का मानना/विश्वास है, वह सब बुद्धिमानोके मानने योग्य नहीं है| वह आस्था ही सत्य और अपनाने योग्य है जिसका अनुकरण अप्तो द्वारा किया गया है| आप्त यानि कि वो मनुष्य जो कि सत्य बोलते, करते और सोचते हैं, हमेशा मानवता के भले का प्रचार करते हैं, निष्पक्ष और विद्वान हैं; परन्तु जो भी अप्तों द्वारा त्याज्य है वह मानने योग्य नहीं है और असत्य है|”

 

अब एक बहुत बड़ा प्रश्न उठताहै:

प्रश्न – हमें क्यों धर्म का पालन करना चाहिए?

उत्तर – इस का उत्तर बहुत सरल है| धर्म हमें उन्नति, पूर्ण – सुख, समानता और मानवता की ओर प्रोत्साहित करता है| धर्म से हमारे मन, दिमाग, इन्द्रियों को पाप करने से मुक्ति मिलती है| धर्म से हमारी सात्विकता, बुद्धि, मानवता और अच्छाई की उन्नति होती है|

 

कुछ लोगों के मन में धर्म के विषय में कुछ प्रश्न उठते होंगे| मैं उनको समझाने का प्रयत्न करता हूँ:

प्रश्न – हम छल के बिना कैसे उन्नति कर सकते हैं; संभवतः हम उतना धन न कमा सकें जिससे हम ठाठदार और आरामदायक जीवन व्यतीत कर सकें?

उत्तर – इस प्रश्न का उत्तर देने से पहेले मैं आप से पूछता हूँ कि ठाठदार और आरामदायक जीवन का अर्थ क्या है? यदि हम कहें कि हम सुख और शांति चाहते हैं, तो हमे अपने आप से पूछना चाहिए कि यह सुख और शांतिमय जीवन थोड़े समय का है या सदा के किए है?निश्चय ही सदा के लिये नहीं है; क्योंकि स्वभाव से मनुष्य प्रतिस्पर्धात्मक (competitive) है और ये जलन, इर्षा आदि नाकारात्मक भावनाओं को जन्म देता है जो कि दबाव और दुःख का कारण है; जबकि धर्म का अनुकरण करने से सकारात्मक भावनाओं का उदय होता है, चाहे हमारे पास धन की कमी ही क्यों न हो| उदहारण के लिये देखा जाये तो दान करने और दीन दुखियों की सहायता करने के बाद मनुष्य की अंतर – भावना में सन्तोष की प्राप्ति होती है| कृपया मुझे गलत मत समझियेगा क्योंकि मैं किसी को धन कमाने या एकत्रित करने से नहीं रोक रहा हूँ| मैं तो केवल निवेदन कर रहा हूँ कि आप धन कमाईये परन्तु बिना लालच के और  दूसरों को बिना हानि पहुचाये| मेरा तात्पर्य यह है कि गलत रास्ते से धन अर्जित करना अनुचित है|

 

प्रशन – यह देखा गया है कि जो धर्म के पथ पर चलता है उसे बहुत कष्ट उठाना पड़ता है|

उत्तर –महर्षि दयानंद गीता (१८:३७) का वचन सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में देते हुए बताते हैं कि “जो – जो विध्या और धर्म प्राप्ति के कर्म हैं वे प्रथम करने मैं विष के तुल्य और पश्चात् अमृत के सदृश होते हैं|” इसका उल्टा अधर्म के लिए सत्य है – आरंभ में अधर्म गुलाब की पंखुड़ियों जैसा लगता है, पर कांटों से हे अंत होता है| इसका अच्छा उदहारण है मानवता की हत्या करने वालों का जीवन| थोड़े समय तक उनके हाथ में शक्ति और शासन रहता है परन्तु उनका अंत दुःख, कलंक और अपमान ही रहता है| प्रत्येक इंसान को धर्म का पालन करना चाहिये; चाहे कितनी ही कठनाइयों का सामना करना पड़े| यह तप कहलाता है|

प्रशन – तप क्या है?

उत्तर – नीचे दी परिभाषा से हम समझने का प्रयास करेंगें:

“जल से शरीर के बाहर के अवयव, सत्याचरण से मन, विध्या और तप अर्थात् सब प्रकार के कष्ट भी सह के धर्म ही के अनुष्ठान करने से जीवात्मा, ज्ञान अर्थात् पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों के विवेक से बुद्धि दृढ़ निश्चय पवित्र होता है|….” सत्यार्थ प्रकाश तृतीयसमुल्लास: – मनुस्मृति (५/१०९)

“तप – शीत, उष्ण, सुख-दुःख आदि दव्न्दों का सहना ……….” –योग दर्शन (२:१)

प्रश्न – हो सकता है कि धर्म का पथ परिवार और मित्रगणों का हमसे  द्वेष करा दे| क्या यह सही होगा कि धर्म अपनाने के लिए हमे परिवार और मित्रगण का त्याग करना पड़े?

उत्तर – हर एक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने परिवार और मित्रों को सलाह दे कि धर्म का ही मार्ग सच्ची उन्नति और प्रसन्नता का मार्ग है| संभवतः आपकी ऐसी सलाह को वे गलत समझे और आपकी बातों पर ध्यान दिए बिना आप से द्वेष भाव रखें; तब आपके पास केवल यह रास्ता रह जाता है कि आप उनके लिए बुरी भावना नहीं रखते हुए उपेक्षा का भव अपनाये|

प्रश्न – धर्म के लक्षण क्या हैं?

उत्तर – महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने नीचे लिखे लक्षणों को बताया है (मनु स्मृति ने दस बताये हैं)

१.      अहिंसा – पूर्णयता वैर त्याग| अर्थात विचारों में भी वैर का त्याग|

२.      धृति – सदा धैर्य रखना|

३.      क्षमा – जो की निंदा, स्तुति, मानापमान, हानिलाभ आदि दुखों में भी सहनशील रहना|

४.      दम – मन को सदा धर्म में प्रवृत्त कर अधर्म से रोक देना अर्थात अधर्म करने की इच्छा भी न उठे|

५.      अस्तेय – चोरी त्याग अर्थात बिना आज्ञा व छल कपट विश्वासघात वा किसी व्यवहार तथा वेदविरुद्ध उपदेश से परपदार्थ का ग्रहण करना चोरी और उसको छोड़ देना साहुकारी कहाती है|

६.      शौच – राग द्वेष पक्षपात छोड़ के भीतर और जल मृत्तिका मार्जन आदि से बाहर की पवित्रता रखनी|

७.      इन्द्रिय-निग्रह – अधर्म आचरणों से रोक के इन्द्रियों को धर्म ही में सदा चलाना|

८.      धी: – मादकद्रव्य बुद्धिनाशक अन्य पदार्थ दुष्टों का संग, आलस्य प्रमाद आदि को छोड़ के श्रेष्ट पदार्थों का सेवन, सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास, धर्माचरण, ब्रह्मचर्य आदि शुभ कर्मों से बुद्धि बढाना|

९.      विद्या – पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त यथार्थज्ञान और उनसे यथायोग्य उपकार लेना, सत्य जैसा आत्मा में वैसा मन में, जैसा मन में वैसा वाणी में, जैसा वाणी में वैसा कर्म में वर्त्तना; इसके विपरीत अविद्या है|

१०.  सत्य – जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना, वैसा ही बोलना और वैसा ही करना भी|

११.  अक्रोध – क्रोधादि दोषों को छोड़के शान्त्यादि गुणों का ग्रहण करना|

ऊपर दिए गए लक्षणों को अलग शीर्षक में समझाने का प्रयत्न करेंगे|

तो ये निश्चय हुआ कि धर्म के बिना मानवता में कोई सुधार नहीं होता इसलिये हर्ष नहीं प्राप्त होता| यही कारण है की हमे कठनाइयों से डरे बिना धर्म का पालन करना चाहिये| हर मनुष्य का उद्देश्य मानवता को बढाना होना चाहिये| महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने नीचे लिखा बहुत ही अच्छा सुझाव दिया है:

“यदपि आज काल बहुत से विद्वान प्रत्येक मतों में हैं| वे पक्षपात छोड़ सर्वतंत्र सिद्धान्त अर्थात् जो – जो बातें सब के अनुकुल सब में सत्य हैं उनका ग्रहण और जो एक दुसरे से विरुद्ध बातें हैं, उनका त्याग कर परस्पर प्रीति से वर्तें वर्तावें तो जगत का पूर्ण हित होवे| क्योंकि विद्वानों के विरोध से अविद्वानो में विरोध बढ़ कर अनेकविध दुःख की वृद्धि और सुख की हानि होती है| इस हानि ने जो कि स्वार्थी मनुष्यों को प्रिय है, सब मनुष्यों को दुखसागर में डुबा दिया है| इनमें से जो कोई सार्वजनिक हित लक्ष में धर प्रवृत होता है उससे स्वार्थी लोग विरोध करने में तत्पर होकर अनेक प्रकार विघ्न करते हैं परन्तु ‘सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:’ अर्थात् सर्वदा सत्य का विजय और असत्य का पराजय और सत्य ही से विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता है| इस दृढ़ निश्चय के आलम्बन से आप्त लोग परोपकार करने से उदासीन हो कर कभी सत्यार्थप्रकाश करने से नहीं हटते|” – सत्यार्थ प्रकाश भूमिका

 

प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अधर्म छोड़ कर मानवता को बढाये| हर मनुष्य को तर्क बुद्धि का प्रयोग करके मानवता को बढाना चाहिये और स्वार्थी मनुष्यों की शिक्षा पर विश्वास नहीं करना चाहिये| एक शिक्षक या प्रचारक जो अपने स्वार्थ के लिए सत्य शिक्षा को बदलता है वह भ्रष्ट मनुष्य है और समाज और मानवता के लिए दीमक के समान है.

 

साधारण शब्दों में, हर एक को ऐसा व्यवहार करना चाहिये जैसा की वह अपने लिये चाहता/चाहती है – उदहारण के लिये, हमे किसी को धोका नहीं देना चाहिये क्योंकि हम धोका खाना नहीं चाहेंगे|

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