Archive | July, 2014

महर्षि दयानन्द कृत व्यवहारभानु: की एक झांकि

22 Jul

विध्या-प्राप्ति के उपाय

प्र – विध्या किस-किस प्रकार और किन कर्मों से प्राप्त होती है?

उ – विध्या चार प्रकार से आती है:

  1. आगमकाल – आगमकाल उसको कहते हैं कि जिससे मनुष्य पढ़ाने वाले से सावधान होकर ध्यान दे के विध्यादि पदार्थ ग्रहण कर सके|
  2. स्वाध्यायकाल – स्वाध्यायकाल उसको कहते हैं कि जो पठन-समय में आचार्य के मुख से शब्द, अर्थ और सम्बन्धों की बातें प्रकाशित हों उनको एकान्त में स्वस्थचित होकर पूर्वापर विचार के ठीक-ठीक ह्रदय में दृढ़ कर सकें|
  3. प्रवचनकाल – प्रवचनकाल उसको कहते हैं कि जिससे दूसरे को प्रीति से विद्याओं को पढ़ा सकना|
  4. व्यवहारकाल – व्यवहारकाल उसको कहते हैं कि जब अपने आत्मा में सत्यविद्या होती है तब यह करना यह न करना, वही ठीक-ठीक सिद्ध होके वैसा ही आचरण करना हो सके|

यह चार प्रयोजन हैं तथा अन्य भी चार कर्म विध्या प्राप्ति के लिए हैं|

  1. श्रवण – श्रवण उसको कहते हैं कि आत्मा मन के और मन श्रोत्र-इन्द्रियों के साथ यथावत् युक्त करके अध्यापक के मुख से जो-जो अर्थ और सम्बन्ध के प्रकाश करनेहारे शब्द निकालें उनको श्रोत्र से मन और मन से आत्मा में एकत्र करते जाना|
  2. मनन – मनन उसको कहते हैं कि जो-जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध आत्मा में एकत्र हुए हैं उनका एकान्त में स्वस्थचित होकर विचार करना कि कौन शब्द किस अर्थ के और कौन अर्थ किस शब्द के साथ सम्बन्ध अर्थात् मेल रखता और इनके मेल में किस प्रयोजन की सिद्धि और उलटे होने में क्या-क्या हानि होती है? इत्यादि|
  3. निदिध्यासन – निदिध्यासन उसको कहते हैं कि जो-जो अर्थ और सम्बन्ध सुने-विचारे हैं वे ठीक-ठीक हैं व नहीं? इस बात की विशेष परीक्षा करके दृढ़ निश्चय करना|
  4. साक्षात्कार – साक्षात्कार उसको कहते हैं कि जिन अर्थों के शब्द और सम्बन्ध सुने, विचारे और निश्चय किए हैं उनको यथावत् ज्ञान और क्रिया से प्रत्यक्ष करके व्यवहारों की सिद्धि से अपना और पराया उपकार करना आदि विध्या की प्राप्ति के साधन हैं|

आइये अब हम इसको साधारणतया आज के वातावरण में देखें| एक मोटा सा दृष्टांत सेकेंडरी स्कूल के विद्यार्थी का ले लीजिये| वह विद्यार्थी जब कक्षा में पड़ता है तो उसका कर्तव्य होता है कि वह बड़े ध्यान से अपने अध्यापक की बात सुने और ग्रहण करे| यह आगमकाल कहलाता है| श्रवण कर्म इसी के अंतर्गत आता है – विद्यार्थी जो भी अध्यापक के मुख से अपने श्रोतों द्वारा सुनता है वह मन से अपने आत्मा में एकत्र करता हे अर्थात sub-conscious में याद कर लेता है| स्कूल में जो सिखा है उसको विद्यार्थी घर आ कर अपने स्टडी रूम में जा कर आलस्य आदि दूर कर के अपनी टेक्स्ट बुक खोल के जो कक्षा में सीखा है उसे अपनी टेक्स्ट बुक से मिला कर और विचार कर के परिपक्व कर ले ताकि वह पूरी तरह से मन में बैठ जाए| इसे स्वाध्यायकाल कहते हैं| कर्म रूप में इसे मनन करना कहते हैं| इसके बाद वही विद्यार्थी का कर्तव्य होता है कि वह दुसरे विद्यार्थियों से मंत्रणा या प्रैक्टिकल करके, तर्क – वितर्क करके जो समझा है उनको सिखाये और स्वयं सीखे| इसे प्रवचनकाल कहते हैं| कर्म रूप में यह निदिध्यासन कहलाता है अर्थात तर्क-वितर्क, टेक्स्ट बुक्स आदि द्वारा निश्चय पर आना| इसके बाद अब जो समझा है उसे प्रैक्टिकल में लाना – उदाहरणत दो द्रव्यों के मिलाने से कौन सा द्रव्य बनता है उसे प्रैक्टिकल Titration के द्वारा जानना|इसे व्यवहारकाल कहते हैं| कर्म रूप में यह साक्षात्कार कहलाता है – जो कक्षा में सिखा था उसको विचार करके, निश्चय करके, यथावत प्रयोग में लाना||

 

यह तो एक मोटा सा उदहारण था; इसी को सूक्ष्मता से अपनाते हुए ऋषिओं की शिक्षा द्वारा अपने जीवन के व्यवहारों में मानवता के उत्कर्ष के लिए लगा दीजिये| यह धर्म का रास्ता हो जायगा और वास्ताव में आप विध्या ग्रहण करना शुरू कर देंगे|

—– पंडित प्रशांत शर्मा

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