Archive | August, 2014

क्या ऋषियों में विरोध होता है?

7 Aug

कई लोगों का मंतव्य है कि ऋषियों के अपने मत होते हैं और कहीं कहीं उनमें आपस में भेद होता है| आइये पहले हम “ऋषि किसको कहते हैं” यह समझ ले| निरुक्त भाष्य (२/३/११) बताता है कि जो सूक्ष्मदर्शी अथवा तत्वदर्शी है उसे ऋषि कहते हैं| ऋग्वेद (१/१/२) कहता है कि “जिसने मन्त्रों के अर्थों को देखा है अर्थात जिसने वेद-मन्त्रों का दर्शन किया है, वह मंत्र-दृष्टा ही ऋषि है”| ऋषि को आप्त भी कहते हैं क्योंकि वह आप्ति प्राप्त कर चुका होता है| योगिराज वात्स्यायन ने महर्षि गौतम के न्याय दर्शन का भाष्य करते हुए आप्त की पूर्ण परिभाषा दी है – “जो साक्षात् सब पदार्थविध्याओं का जानने वाला, कपट आदि दोषों से रहित धर्मात्मा है, कि जो सदा सत्यवादी, सत्यमानी और सत्यकारी है, जिसको पूर्ण विध्या से आत्मा में जिस प्रकार का ज्ञान है उसके कहने की इच्छा की प्रेरणा से सब मनुष्यों पर कृपाद्रष्टि सब सुख होने के लिए सत्य का उपदेश का करनेवाला है और जो पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त सब पदार्थों को यथावत् साक्षात् करना और उसी के अनुसार वर्त्तना है इसी का नाम आप्ति है|” ऋषि असम्प्रज्ञात (निर्बीज) समाधी (ईश्वर का साक्षात्कार और मन की निरुद्ध अवस्था – मन/चित की संपूर्ण वृत्तिओं का निरोध) प्राप्त कर चुका होता है|

जैसा कि निरुक्त भाष्य का कहना है जो सूक्ष्म तत्वों का साक्षात्कार कर लेते हैं| उदाहराण के लिए लीजिये दो व्यक्तियों का एक लकड़ी की कुर्सी को देखना| उन दोनों व्यक्तियों से अगर पुछा जाय तो दोनों कहेंगे कि वह कुर्सी है और लकड़ियों से बनाई गयी है| यह तो आम मनुष्य का देखना है; ऋषियों का साक्षात्कार निरभ्रम और सूक्ष्मता के स्तर पर होता है – अर्थात कितने परमाणुओं का मेल है, किस तत्व की कितनी मात्रा है और किस महाभूत की प्राथमिकता है आदि| अब पाठकगण स्वयं विचार करें कि जब ऋषियों का साक्षात्कार एक सा है तो उनके अलग अलग मत कैसे होंगे? हां यह बात और है कि सब ऋषियों का ज्ञान एक बराबर नहीं होता है| उदाहरणार्थ एक ऋषि ने कुर्सी को देखा और दुसरे ने नहीं देखा या उसकी आवश्यकता नहीं हुई तो दुसरे को उसका ज्ञान नहीं होगा| पर जिन जिन वस्तुओं का ज्ञान दोनों ऋषियों में है वह एक सा होगा| अब अगर हम कहें कि स्वार्थवश ऋषिओं ने अलग अलग मत दे दिए तो यह हमारी भूल होगी क्योंकि जैसा ऊपर आप्त की परिभाषा में समझाया गया है ऋषि कपट आदि दोषों से रहित होता है और सत्यवादी, सत्यमानी और सत्याकारी होता है, इसीलिये उसमे पक्षपात और निजी स्वार्थ नहीं होता और वह संपूर्ण मानवता के सुख के लिए सत्य का उपदेश करता है|

यह भ्रान्ति भी लोगों में पाई जाती है कि ऋषि अपना शरीर छोड़ कर दुसरे शरीरों में भोग करने के लिए जाते थे और भोगने के बाद वापस अपने शरीर में आ जाते थे| पाठकगण विचार करें कि जिसने असम्प्रज्ञात समाधी प्राप्त करली हो और जो मोक्ष रूपी आनंद का भागी हो गया हो वह संसार के तुच्छ भोग में क्यों फंसेगा? जिस तरह से आम मनुष्य के सामने अगर स्वच्छ जल और गटर का दूषित जल रख दें तो वह गटर के दूषित जल को ठुकरा कर स्वच्छ जल ही पियेगा| दूसरी बात यह है कि शरीर में आवागमन ईश्वर की व्यवस्था से होता है – न्यायपूर्वक कर्मफल के अनुसार होता है|

ऊपर के अनुच्छेदों से यह हमने देख लिया कि ऋषिओं में विरोध नहीं होता था क्योंकि दो विरोधी वाक्यों में एक ही सत्य हो सकता है| आइये अब देखतें हैं कि क्या आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ऋषि थे? पाठकगण स्वयं ही निश्चय कर लें कि सन १८७५ इसवी (१९३२ वि.) से जितने भी महर्षि दयानन्द रचित ग्रन्थ हैं उनमें कहीं भी आर्ष ग्रंथों से विरोध नहीं है| भेद केवल पक्षपाती/स्वार्थी मनुष्यों द्वारा आर्ष ग्रंथो का भाष्य करने में मिलता है| महर्षि दयानन्द के आचारण में कहीं भी असत्य, पक्षपात, स्वार्थ, द्वेष, अहंकार, आदि नहीं दिखते हैं; बल्कि सत्यभाषण, सत्यव्यवहार, सत्य पालने में निर्भीकता, असत्य का विरोध, समस्त मानवों के उत्कर्ष की भावना/कार्य, अक्रोध आदि का प्रमाण मिलता है|

अगर पाठकगण किसी भी ऋषि प्रणीत ग्रंथों में विरोध देखतें हैं तो कृपया मुझे अवगत करायें| पणबंध (शर्त) केवल इतनी है कि ऋषियों के ग्रन्थ देखें जाएं न कि किसी दूसरे विद्वान का भाष्य| क्योंकि अगर कोई अपनी ऑंखें बंद करके उसके ऊपर काली पट्टी बांध ले और कहे कि सूर्य प्रकाश नहीं देता तो समझदार मनुष्यों को उसका विशवास नहीं करना चाहिये|

मनुष्यों के लिए यह अनिवार्य है कि अगर वे स्वयं का और मानवता का भला चाहते है तो ऋषिओं के बताये मार्ग पर चले, ऋषिओं से विरोध करके नहीं| न्याय और योग दर्शनों ने ऋषिओं की शिक्षा को शब्द प्रमाण के अंतर्गत माना है|

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