Archive | October, 2016

आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली को शंका समाधान पत्र

29 Oct

यह ब्लॉग केवल मेरे पिछले ब्लॉग (क्या श्री राम दीवाली के दिन वनवास से अयोध्या लोटे थे?) के निष्कर्ष के प्रमाण में है | इस भेजे हुए पत्र का आज तक मुझे उत्तर नहीं दिया गया है और न ही उत्तर मिलने की आशा है | मेरा उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं है| मेरा उद्देश्य केवल मानव में जागरण की भावना लाना है | मेरे इस ब्लॉग को इसी भाव से देखें और लेवें | यह पत्र २४ दिसम्बर २०१२ में प्रकाशित आर्य सन्देश के ऊपर लिखा गया था | यह पत्र भेजने की तिथि १९ जनवरी २०१३ है |

 

आदरणीय सम्पादक महोदय,

नमस्ते,

 

में आपका और दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का आर्य सन्देश के लिये हार्दिक धन्यवाद करता हूँ | मानव जीवन के सुधार के लिए ऋषिओं का दिखाया गया मार्ग अनिवार्य है |

 

आर्य सन्देश वर्ष ३६, अंक ७ में डॉ. भारतेन्दु जी का वेद और योग पड़कर मन में कुछ शंकाएं उपस्तिथ हुईं सो नीचे लिख रहा हूँ | आशा करता हूँ कि उनका समाधान होगा |

  1. आपने अपनी टिप्पणी में वेद को अति विशेष ईश्वरीय महाकाव्य कहा है |
  • कृपया प्रमाण दें की किस ऋषि ने यह लिखा है की वेद अति विशेष ईश्वरीय महाकाव्य है?
  1. आपने अपनी टिप्पणी में लिखा है की वेद और योग दोनों का महत्व विशेष रूप से है |
  • क्या वेद और योग पृथक हैं? जबकि आप अपनी टिप्पणी में लिख रहे हैं की योग वेद में वर्णित हैं |
  1. फिर आप लिखते हैं की वेद और योग दोनों विषय भिन्न हैं |
  • क्या दो विरोधी वाक्य सही हो सकतें हैं?
  1. लेखक ने योग को परमात्मा और आत्मा का मिलन लिखा है |
  • क्या व्यापक और व्याप्य होने से परमात्मा और आत्मा मिले हुए नहीं हैं ? दोनों की सत्ता अलग है पर सर्वव्यापक होने से परमात्मा आत्मा में भी है |
  1. लेखक ने योग साधना के मुख्य दो भेद बताएं हैं – राजयोग और हठयोग |
  • महर्षि दयानन्द ने हठयोग वर्जित किया है (देखिये सत्यार्थ प्रकाश तृतीय सम्मुल्लास)|
  1. लेखक ने हठयोग को राजयोग का पूरक लिखा है |
  • क्या महर्षि पातंजलि, व्यास और दयानन्द को योग दर्शन में अपूर्णता नहीं दिखी (जो की लेखक को दिख गयी) |
  1. योगानां राजा राजयोग: |
  • किस ऋषि ने लिखा है प्रमाण दीजिये |
  1. लेखक ने हठयोग के लिए लिखा है की यह राजयोग की पूरक पद्धति है | इसमें आसान, प्राणायाम और षट्कर्म को अधिक महत्व दिया गया है |
  • क्या राजयोग में प्राणायाम के बिना चित निरोध किया जा सकता है?
  1. लेखक ने हठयोग प्रदीपिका का उदहारण देते हुए हठयोग को राजयोग की सिद्धि की सीडी कहा है |
  • हठयोग प्रदीपिका निषिद्ध है (देखिये सत्यार्थ प्रकाश तृतीय सम्मुल्लास)|
  1. धारणा का सूत्र और अर्थ गलत दिया गया है |
  • विभुतिपाद का पहला सूत्र है “देशबन्धश्चित्तस्य धारणा” न की “देश्बन्धश्चित्त्स्याणाम्”| सहि अर्थ है – “देह को किसी अंगविशेष में बांध देना धारणा है” | लेखक के अनुसार किसी विशेष स्थान या बिन्दु पर केन्द्रित करना नहीं क्यों की इससे मूर्तिपूजा की पुष्टि हो सकती है |

इस सम्पूर्ण लेख में ऋषि विरोध मिलता है | आशा करता हूँ की आप मेरी शंकाओ का समाधान करेंगे अथवा अगले अंक में क्षमा याचना करते हुए यह लेख वापस ले लेंगे | मिथ्या ज्ञान से कभी मानवता की वृद्धि नहीं हो सकती किंतु केवल ह्रास ही हो सकता है |

 

ऋषि भक्त और आर्य समाज का सेवक,

प्रशांत शर्मा

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क्या श्री राम दीवाली के दिन वनवास से अयोध्या लोटे थे ?

29 Oct

आज फिर कार्तिक अमावस्या आ गयी है | ३० अक्तूबर २०१६ ईस्वी या कार्तिक कृष्ण पक्ष १५ सन् २०७३ विक्रम संवत | आज विश्व भर में दीवाली पर्व की खुशियाँ मनाई जायेंगी; असंख्य दीपकों द्वारा अँधेरे पर उजाले की विजय घोषित की जाती है | आज ही के दिन १८८३ ईस्वी या १९४० विक्रम को, मंगलवार के दिन, सायंकाल के ६ बजे, भारत के राजस्थान प्रान्त के अजमेर जिले में  महान समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने नश्वर शरीर से महाप्रस्थान किया था | सत्य उजाले का प्रतीक है और असत्य अँधेरे का | मनुष्यों को उचित है कि वे सर्वदा सत्य का ग्रहण करें और असत्य का त्याग |

जब दीवाली की बात होती है तो श्री राम के वनवास से लौटने की बात भी होती है | आइये विचार करें कि यह कहाँ तक सत्य है |

यह तो पाठकों को विदित होगा कि श्री राम के राज्याभिषेक का अनुमोदन परिषद् ने चैत्र मास में किया था | वाल्मीकि रामयाण के अयोध्या काण्ड के तृतीयः सर्ग के चोथे श्लोक में महाराज दशरथ ने नगर और जनपद के प्रमुख लोगों के समक्ष वसिष्ठ और वामदेव आदि ब्राह्मणों से कहा “ यह चैत्र मास बड़ा सुन्दर और पवित्र है, इसमें सारे वन – उपवन खिल उठे हैं; अतः इस समय श्रीराम का युवराज पद पर अभिषेक करने के लिये आप लोग सब सामग्री एकत्र कराइये” |

पाठकों को यह भी विदित होगा की जिस दिन श्री राम का अभिषेक होना था उसके दूसरे ही दिन उन्हें वनवास जाना पड़ा | पाठकगण यह भी जान लें कि चैत्र मास मार्च और अप्रैल में होता है |

अयोध्याकाण्ड में ही महात्मा भरत श्री राम के वापस लोटने और राज्य करने के आदेश पर कहते हैं “रघुकुलशिरोमणे ! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर नूतन वर्ष के प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा” |

पाठकों को यह विदित होवे कि श्री राम और श्री भरत दोनों ही सत्यवादी थे और दो विरोधी बातें नहीं करते थे |

पाठकगण स्वयं ही निश्चय कर लें कि चैत्र के गए हुवे का वर्ष चैत्र में ही पूर्ण होगा न की कार्तिक को | अब अगर श्री राम का आगमन चैत्र के बजाये कार्तिक में होता है तो दो बातें हो सकती हैं:

  1. श्री राम चौदह वर्षों कि समाप्ति से पहले आ गए – चैत्र से ६ महीने पहले तेरहवें वर्ष के कार्तिक में या
  2. श्री राम चौदह वर्षों कि समाप्ति के ६ महीने बाद आये – चैत्र से ६ महीने बाद चौदहवें वर्ष में |

पहले दृष्टान्त में श्री राम झूठे हो जाते हैं क्योंकि वे चौदह वर्ष से पहले आ गये और दूसरे में श्री भरत क्योंकि उन्होंने अपने आप को अग्नि में भस्म नहीं किया | सत्य तो यह है की श्री राम का अयोध्या आगमन चैत्र मास में ही हुआ था |

युद्धकाण्ड में श्री राम की अयोध्या वापसी में महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उतरने के वृतांत में वाल्मीकि रामायण कहती है – “चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भरद्वाज आश्रम पहुंचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया “ |

यहां पर शंका होती है कि किस मास की पंचमी ? इसका समाधान यह है की मास बताये बिना तिथि बताई जाये तो प्रथम मास की जननी चाहिये – अर्थात् चैत्र की पंचमी |

ऊपर दिये हुए तर्क और प्रमाणों से सिद्ध होता है कि श्री राम का अयोध्या आगमन दीवाली के दिन नहीं हुआ था |

दीवाली पर लक्ष्मी पूजन की भी प्रथा है और कोई लोग नारायण और लक्ष्मी का अर्थ परमेश्वर और उसकी कृपा लेते हैं | आइये महर्षि दयानंद के सत्यार्थ प्रकाश द्वारा उनका अर्थ जाने |

महर्षि प्रथम समुल्लास में अर्थ देते हैं –

नारायण – जल और जीवों का नाम नारा है, वे अयन अर्थात् निवासस्थान हैं जिसका इसलिये सब जीवों में व्यापक परमात्मा का नाम नारायण है |

लक्ष्मी – जो सब चराचर जगत् को देखता, चिह्नित अर्थात् दृश्य बनाता, जैसे शरीर के नेत्र, नासिका और वृक्ष के पत्र, पुष्प, फल, मूल, पृथिवी, जल के कृष्ण, रक्त, श्वेत, मृत्तिका, पाषाण, चन्द्र, सूर्य्यादी चिह्न बनाता तथा सब को देखता, सब शोभाओं की शोभा और जो वेदादि शास्त्र वा धार्मिक विद्वान् योगियों का लक्ष्य अर्थात् देखने योग्य है इससे परमेश्वर का नाम लक्ष्मी है |

दीवाली की शुभ कामनाओं के साथ पाठकों से मेरा निवेदन है की जिस तरह आज उजाला अँधेरे पर हावी पड़ रहा उसी तरह आप भी सत्य को ग्रहण करके असत्य का त्याग करिये | महर्षि दयानन्द द्वारा हमें शिक्षा रुपी जो मणि मिले उससे हम अपने जीवन का उत्थान करें | ऋषि शिक्षा को अपने आचरण में लायें केवल बातों से जीवन नहीं सुधरता | जो निकले हुए सूर्य को देखते हुए भी नकारता है उसे विद्वान् नहीं कहा जाता है| आज आर्य समाज के कई आचार्य एवं शिक्षक स्वार्थ वश हठ योग आदि ऋषि विरुद्ध क्रियाओं का प्रचार कर रहें है | मेरी इन विद्वानों से प्रार्थना है की वे ऋषिओं की पद्धति को ही अपनायें एवं मानव मात्र को शिक्षित करें |

—– पंडित प्रशांत शर्मा

ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना

19 Oct

ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना

यह तीन शब्द, स्तुति, प्रार्थना और उपासना आप हर सत्संग में सुनते हैं | हर किसी के मन में यह प्रश्न उठता है कि यह होते क्या है? क्या यह तीनो एक ही हैं? और अगर एक हैं तो ईश्वरस्तुतिप्रार्थानोपासना हम क्यों बोलते हैं?

आइये सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास से इनकी परिभाषा देखते हैं|

स्तुति – जिससे ईश्वर में प्रीति, उसके गुण कर्म स्वभाव से अपने गुण कर्म स्वभाव का सुधारना होता है उसे स्तुति कहते हैं|

प्रार्थना – जिससे निरभिमानता, उत्साह और सहाय का मिलना होता है उसे प्रार्थना कहते हैं|

उपासना – जिससे परब्रह्म से मेल और उसका साक्षात्कार होता है उसे उपासना कहते हैं|

प्रश्न – स्तुति कितने प्रकार की होती है?

उत्तर – स्तुति दो प्रकार की होती है:

  • सगुण – वह परमात्मा सब मैं व्यापक, शीघ्रकारी और अनंत बलवान जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सबका अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा करता है| यह सगुण स्तुति कहलाती है अर्थात् जिस-जिस गुण से सहित परमेश्वर की स्तुति करना वह सगुण|
  • निर्गुण –(अकाय) अर्थात् वह कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिसमें छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिसमें क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग द्वेषादी गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है|

प्रश्न – सगुण माने साकार और निर्गुण माने निराकार, ऐसा हम सुनते और मानते आये हैं|

उत्तर – यह आपका सुनना और मानना गलत है क्यों कि ईश्वर सर्वदा स्वतंत्र है और कभी भी शरीर और नस-नाड़ी या जन्म–मरण के बन्धन में नहीं आता है; इन गुणों से रहित होने के कारण वह निर्गुण कहलाता है| उसी प्रकार सर्वज्ञ, न्यायकारी आदि गुणों से सहित होने के कारण वह सगुण कहलाता है|

प्रश्न – स्तुति का क्या फल होता है?

उत्तर– स्तुति से फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण कर्म स्वभाव अपने भी करना| जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवें| और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है|

प्रश्न – प्रार्थना का क्या फल होता है?

उत्तर – प्रार्थना में यह जानते हुए कि हम से भी कहीं बड़ी शक्ति है, हमारे अभिमान का नाश करती है| उसी प्रकार जब हमारा मन दुर्बलता से भर जाता है तो यही प्रार्थना हमारे अन्दर ईश्वर की सहायता से उत्साह और शक्ति का संचार करती है आदि| प्रार्थना द्वारा हम ईश्वर से मेधा नामक बुद्धि, तेज, धैर्य, पराक्रम, सामर्थ्य, बल आदि मांगते हुए अपने कर्तव्य पथ पर पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए चलते जायें|

प्रश्न – उपासना कैसे की जाती है?

उत्तर – उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है| साधारण शब्दों में कहें तो हमारा मन जो हमेशा इधर उधर भागता रहता है उसे विषयों से हटा कर अंदर की और लगा दें – जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने कवच के अंदर समेट लेता है उसी प्रकार मनुष्य अपने मन को अपनी अन्तरात्मा की और मोड़ दे |

प्रश्न – इसको सपष्ट करके समझाओ|

उत्तर – महर्षि पातंजलि अपने योग सूत्र में समझाते हैं – जो उपासना का आरंभ करना चाहै उसके लिये यही आरंभ है कि वह किसी से वैर न रक्खे, सर्वदा सब से प्रीति करे | सत्य बोले | मिथ्या कभी न बोले | चोरी न करे | सत्य व्यवहार करे | जितेन्द्रिय हो | लम्पट न हो और निरभिमानी हो | अभिमान कभी न करे | यह पांच प्रकार के यम मिल के उपासनायोग का प्रथम अंग है |

फिर महर्षि आगे कहते हैं कि राग द्वेष छोड़ भीतर और जलादि से बाहर पवित्र रहे | धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे | प्रसन्न होकर आलस्य छोड़ सदा पुरुषार्थ किया करे | सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे, अधर्म का नहीं | सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढ़े पढ़ावे | सत्पुरुषों का संग करे और ‘ओ‌३म्’ इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार करे नित्यप्रति जप किया करे | अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे | इन पांच प्रकार के नियमों को मिला के उपासनायोग का दूसरा अंग कहता है |

प्रश्न – क्या ऊपर दिए दो अंगों का ही योग सूत्र में वर्णन है?

उत्तर – महर्षि पातंजलि ने योग सूत्र में योग के आठ अंग बतायें हैं; जिनका वर्णन हम आने वाले अंको में प्रकाशित करने का प्रयत्न करेंगे |

प्रश्न – क्या यह जो योगा की कक्षायें चलतीं है वह यह योग सिखाती हैं?

उत्तर – जी नहीं, अधिकांश कक्षायें हठ योग सिखातीं हैं | हठ योगा किसी भी ऋषि द्वारा प्रतिपादित नहीं है | महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय सम्मुल्लास में हठ योग वर्जित किया है |

प्रश्न – प्राणायाम का प्रमाण क्या है ?

उत्तर – योगदर्शन का सूत्र (२/२८) कहता है कि जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है | जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है |

मनुस्मृति का श्लोक (६/७१) कहता है – जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर शुद्ध होते हैं वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं |

प्रशन – प्राणायाम की विधि क्या है?

उत्तर – महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय सम्मुल्लास में योगदर्शन के समाधिपाद के चौतींसवे (३४) सूत्र कि व्याख्या करते हुए समझाया हे – जैसे अत्यंत वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे | जब बाहर निकालना चाहे तब मुलेंद्रिय को ऊपर खींच रखे तब तक प्राण बाहर रहता है | इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है | जब गभराहट हो तब धीरे – धीरे भीतर वायु को ले के फिर भी वैसे ही करता जाय जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (ओ३म्) इसका जप करता जाय इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है |

प्रश्न – प्राणायाम कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर – प्राणायाम के प्रकार – एक ‘बाह्यविषय’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना | दूसरा ‘आभ्यंतर’ अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाय उतना रोक के | तीसरा ‘स्तम्भवृत्ति’ अर्थात् एक ही बार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना | चौथा ‘बाह्याभ्यंतराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिये बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की और प्राण को धक्का देकर रोकता जाय | ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं | बल पुरुषार्थ बढ़ कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है | इससे मनुष्य शरीर में वीयर्य् वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर, बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा |

*** विस्तृत जानकारी के लिये महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश का तृतीय और सप्तम समुल्लास पढ़िये |

लेखक: श्री पंडित प्रशान्त कुमार शर्मा जी

Ishwar Stuti Prarthana aur Upasana

19 Oct

Ishwar Stuti Prarthana aur Upasana

We hear these three words Stuti, Prarthana and Upasana in every satsang. A question arises in everyone’s mind that what are these? Do they represent the same meaning? If yes, then why do we say the three words?

Let’s ponder on the definition of these from the seventh chapter of “The Light of Truth”.

Stuti – or appreciation creates love for God and helps a man to reform his character by contemplating the character of God.

Prarthana – or prayer creates humility, hopefulness and confidence.

Upasana – conduces to communion with God and his realization.

Question – How many kinds of Stuti is there?

Answer – Stuti or appreciation is of two kinds:

  • Sagun Stuti – or Positive appreciation consists of the contemplation of those attributes which God has, e.g. He is all-pervading, soon-acting, infinite, strong, pure, all-knowing, existing within all, transdental, ever-living, and self-proven, and that He makes known to His ever-living subjects, i.e. souls, through His ever-living knowledge the correct meanings of things in the form of the Vedas. Here we think of those qualities which exist in God.
  • Nirgun Stuti – or Negative appreciation is the contemplation of the nonexistence of certain qualities which do not belong to God but belong to other things e.g. He does not come into a body. He does not take a physical birth; He has no defects in Him. He does not submit Himself to the limitations of nerves etc. He never does any sinful thing, at no time has He trouble, pain and ignorance. Here, we think of God as being free from foolery, aversion etc.

Question – Sagun means consisting of form and Nirgun means without form, this is what we have heard and is our belief too.

Answer – What you have heard and your belief is wrong because God is always free and is never bounded with the limitations of nerves and cycle of birth and death; devoid of these qualities He is called Nirgun. Similarly, Consisting of All-knowing, Just etc. qualities/capabilities, He is termed as Sagun.

Question – What are the fruits/purpose of Stuti?

Answer – The purpose of Stuti or appreciation is to imbibe those qualities, actions and characteristics which God has e.g. He is just, therefore we too should be just. If a man sings laudations to God very loudly like a court-fool and does not reform his conduct, his Stuti or prayer is meaningless.

Question – What are the fruits/purpose of Prarthana?

Answer – In prayer we know that there is a power much greater than us, thus destroys our arrogance. Similarly, when our mind is engulfed in weakness, this prayer generates internal hopefulness, confidence etc. in us by the grace of God. Through prayer we should ask for Medha intellect, enlightenment, patience, bravery, capabilities, strength etc. and should walk on our path of duty by doing human efforts.

Question – How do we do Upasana?

Answer – The word Upasana or communion means to sit close (union of two). In simple words, our mind which is always running around after material aspects should be turned inwards away from material subject/s – like a tortoise/turtle withdraws its limbs in his shell, so should the humans turn their minds inwards towards the soul.

Question – Please elaborate this.

Answer – Maharishi Patanjali in his Yog Sutras explain that – for a person intending to start Upasana should begin by bearing no ill-will towards anybody, love all persons at all times. Always speak the truth (Satya); never speak the untruth (Asatya). Shun thievery; have fair dealings. Govern his senses; never be sensual. Be humble; never be arrogant. These five Yamas form the first step of Upasana Yog.

Maharishi further teaches that clean your inside by shunning infatuation and aversion; clear your outside body with water. Work righteously, neither be overjoyed at profit, nor over pained at loss; be not idle, work assiduously with a cheerful heart. Control your joys and sorrows, practise virtue and shun vice. Study true (Satya) books and associate with truthful men. Recite God’s name “AUM” or “OM” and concentrate your thought on its meanings, surrender yourself to the will of the Supreme Being. These five Niyamas constitute the second step of Upasana yog.

Question – Are the above two steps only described in Yog Sutras?

Answer – Maharishi Patanjali has described eight steps required to be in communion with God and realize his existence as an omnipresent and omniscient being. I will attempt to describe these steps in the upcoming blogs.

Questions – Does the prevalent Yoga classes teach this Yog?

Answer – No, most of these classes teach Hatha Yoga. Hatha Yoga is not preached by any Rishi. Maharishi Dayanand has advised to shun Hatha Yoga in the third chapter of “The light of Truth”.

Question – What is the proof of Pranayaam?

Answer- The sutra (2/28) of Yog Darshan says that when a man does breathing exercises, every impurity is removed in quick succession and the light of knowledge dawns upon him. The inner light goes on increasing until the salvation (Moksha) is attained.

Manu Smriti (6/71) says that just as the impurities of the metals, e.g., gold etc., are destroyed by heating them in fire, similarly the defects of the mind and other senses are removed and their purity is achieved by the performance of the breathing exercise.

Question – What is the method of Pranayaam?

Answer – In the third chapter of “The Light of Truth”, Maharishi Swami Dayanand Saraswati explains the 34th Sutra of Yog Darshan’ s Samadhipaad  – Just as strong vomiting throws out food and water, similarly the breath should be forcibly thrown out and checked there as long as possible. When it is intended to throw out the breath, the pelvis should be kept pulled upward. So long will the breath remain out. This is the way how to keep the breath out long. When there is a feeling of uneasiness, then the breath should be slowly drawn in. The above process should be repeated according to the capacity and desire. This should be accompanied by the recitation of the sacred syllable ‘OM’ or ‘AUM’ in the mind. This conduces to the purification and firmness of the Soul and the mind.

Question – How many types of Pranayaam are there?

Answer – Types of Pranayaam or breathing exercises – breathing exercise number one is ‘External’ i.e. to check the breath outside. Number two is stopping the breath inside as long as possible. Number three is immediate checking, i.e. stopping the breath all at once at whatever place one desires. Number four is ‘Out-in-throwing’ or drawing the breath forcibly inside when it has the tendency to go in. By thus counteracting the inspiration and expiration both, the movements are kept in check and control of breath leads to the subjugation of the mind and the senses. This process increases the strength and energy and so sharpens the intellect that it can easily apprehend the most obtuse and subtle problems. This helps the development of the vital fluid (semen) in the man’s body, which in turn is productive of firm strength, courage, control of senses, and acquisition of the knowledge of all sciences in no time.

*** For further elaboration and understanding, please read the third and seventh chapters of “The Light of Truth” written Maharishi Swami Dayanand Saraswati.

Author:  Pt. Prashant Kumar Sharma