ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना

19 Oct

ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना

यह तीन शब्द, स्तुति, प्रार्थना और उपासना आप हर सत्संग में सुनते हैं | हर किसी के मन में यह प्रश्न उठता है कि यह होते क्या है? क्या यह तीनो एक ही हैं? और अगर एक हैं तो ईश्वरस्तुतिप्रार्थानोपासना हम क्यों बोलते हैं?

आइये सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास से इनकी परिभाषा देखते हैं|

स्तुति – जिससे ईश्वर में प्रीति, उसके गुण कर्म स्वभाव से अपने गुण कर्म स्वभाव का सुधारना होता है उसे स्तुति कहते हैं|

प्रार्थना – जिससे निरभिमानता, उत्साह और सहाय का मिलना होता है उसे प्रार्थना कहते हैं|

उपासना – जिससे परब्रह्म से मेल और उसका साक्षात्कार होता है उसे उपासना कहते हैं|

प्रश्न – स्तुति कितने प्रकार की होती है?

उत्तर – स्तुति दो प्रकार की होती है:

  • सगुण – वह परमात्मा सब मैं व्यापक, शीघ्रकारी और अनंत बलवान जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सबका अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा करता है| यह सगुण स्तुति कहलाती है अर्थात् जिस-जिस गुण से सहित परमेश्वर की स्तुति करना वह सगुण|
  • निर्गुण –(अकाय) अर्थात् वह कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिसमें छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिसमें क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग द्वेषादी गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है|

प्रश्न – सगुण माने साकार और निर्गुण माने निराकार, ऐसा हम सुनते और मानते आये हैं|

उत्तर – यह आपका सुनना और मानना गलत है क्यों कि ईश्वर सर्वदा स्वतंत्र है और कभी भी शरीर और नस-नाड़ी या जन्म–मरण के बन्धन में नहीं आता है; इन गुणों से रहित होने के कारण वह निर्गुण कहलाता है| उसी प्रकार सर्वज्ञ, न्यायकारी आदि गुणों से सहित होने के कारण वह सगुण कहलाता है|

प्रश्न – स्तुति का क्या फल होता है?

उत्तर– स्तुति से फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण कर्म स्वभाव अपने भी करना| जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवें| और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है|

प्रश्न – प्रार्थना का क्या फल होता है?

उत्तर – प्रार्थना में यह जानते हुए कि हम से भी कहीं बड़ी शक्ति है, हमारे अभिमान का नाश करती है| उसी प्रकार जब हमारा मन दुर्बलता से भर जाता है तो यही प्रार्थना हमारे अन्दर ईश्वर की सहायता से उत्साह और शक्ति का संचार करती है आदि| प्रार्थना द्वारा हम ईश्वर से मेधा नामक बुद्धि, तेज, धैर्य, पराक्रम, सामर्थ्य, बल आदि मांगते हुए अपने कर्तव्य पथ पर पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए चलते जायें|

प्रश्न – उपासना कैसे की जाती है?

उत्तर – उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है| साधारण शब्दों में कहें तो हमारा मन जो हमेशा इधर उधर भागता रहता है उसे विषयों से हटा कर अंदर की और लगा दें – जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने कवच के अंदर समेट लेता है उसी प्रकार मनुष्य अपने मन को अपनी अन्तरात्मा की और मोड़ दे |

प्रश्न – इसको सपष्ट करके समझाओ|

उत्तर – महर्षि पातंजलि अपने योग सूत्र में समझाते हैं – जो उपासना का आरंभ करना चाहै उसके लिये यही आरंभ है कि वह किसी से वैर न रक्खे, सर्वदा सब से प्रीति करे | सत्य बोले | मिथ्या कभी न बोले | चोरी न करे | सत्य व्यवहार करे | जितेन्द्रिय हो | लम्पट न हो और निरभिमानी हो | अभिमान कभी न करे | यह पांच प्रकार के यम मिल के उपासनायोग का प्रथम अंग है |

फिर महर्षि आगे कहते हैं कि राग द्वेष छोड़ भीतर और जलादि से बाहर पवित्र रहे | धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे | प्रसन्न होकर आलस्य छोड़ सदा पुरुषार्थ किया करे | सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे, अधर्म का नहीं | सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढ़े पढ़ावे | सत्पुरुषों का संग करे और ‘ओ‌३म्’ इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार करे नित्यप्रति जप किया करे | अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे | इन पांच प्रकार के नियमों को मिला के उपासनायोग का दूसरा अंग कहता है |

प्रश्न – क्या ऊपर दिए दो अंगों का ही योग सूत्र में वर्णन है?

उत्तर – महर्षि पातंजलि ने योग सूत्र में योग के आठ अंग बतायें हैं; जिनका वर्णन हम आने वाले अंको में प्रकाशित करने का प्रयत्न करेंगे |

प्रश्न – क्या यह जो योगा की कक्षायें चलतीं है वह यह योग सिखाती हैं?

उत्तर – जी नहीं, अधिकांश कक्षायें हठ योग सिखातीं हैं | हठ योगा किसी भी ऋषि द्वारा प्रतिपादित नहीं है | महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय सम्मुल्लास में हठ योग वर्जित किया है |

प्रश्न – प्राणायाम का प्रमाण क्या है ?

उत्तर – योगदर्शन का सूत्र (२/२८) कहता है कि जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है | जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है |

मनुस्मृति का श्लोक (६/७१) कहता है – जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर शुद्ध होते हैं वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं |

प्रशन – प्राणायाम की विधि क्या है?

उत्तर – महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय सम्मुल्लास में योगदर्शन के समाधिपाद के चौतींसवे (३४) सूत्र कि व्याख्या करते हुए समझाया हे – जैसे अत्यंत वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे | जब बाहर निकालना चाहे तब मुलेंद्रिय को ऊपर खींच रखे तब तक प्राण बाहर रहता है | इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है | जब गभराहट हो तब धीरे – धीरे भीतर वायु को ले के फिर भी वैसे ही करता जाय जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (ओ३म्) इसका जप करता जाय इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है |

प्रश्न – प्राणायाम कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर – प्राणायाम के प्रकार – एक ‘बाह्यविषय’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना | दूसरा ‘आभ्यंतर’ अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाय उतना रोक के | तीसरा ‘स्तम्भवृत्ति’ अर्थात् एक ही बार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना | चौथा ‘बाह्याभ्यंतराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिये बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की और प्राण को धक्का देकर रोकता जाय | ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं | बल पुरुषार्थ बढ़ कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है | इससे मनुष्य शरीर में वीयर्य् वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर, बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा |

*** विस्तृत जानकारी के लिये महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश का तृतीय और सप्तम समुल्लास पढ़िये |

लेखक: श्री पंडित प्रशान्त कुमार शर्मा जी

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