आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली को शंका समाधान पत्र

29 Oct

यह ब्लॉग केवल मेरे पिछले ब्लॉग (क्या श्री राम दीवाली के दिन वनवास से अयोध्या लोटे थे?) के निष्कर्ष के प्रमाण में है | इस भेजे हुए पत्र का आज तक मुझे उत्तर नहीं दिया गया है और न ही उत्तर मिलने की आशा है | मेरा उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं है| मेरा उद्देश्य केवल मानव में जागरण की भावना लाना है | मेरे इस ब्लॉग को इसी भाव से देखें और लेवें | यह पत्र २४ दिसम्बर २०१२ में प्रकाशित आर्य सन्देश के ऊपर लिखा गया था | यह पत्र भेजने की तिथि १९ जनवरी २०१३ है |

 

आदरणीय सम्पादक महोदय,

नमस्ते,

 

में आपका और दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का आर्य सन्देश के लिये हार्दिक धन्यवाद करता हूँ | मानव जीवन के सुधार के लिए ऋषिओं का दिखाया गया मार्ग अनिवार्य है |

 

आर्य सन्देश वर्ष ३६, अंक ७ में डॉ. भारतेन्दु जी का वेद और योग पड़कर मन में कुछ शंकाएं उपस्तिथ हुईं सो नीचे लिख रहा हूँ | आशा करता हूँ कि उनका समाधान होगा |

  1. आपने अपनी टिप्पणी में वेद को अति विशेष ईश्वरीय महाकाव्य कहा है |
  • कृपया प्रमाण दें की किस ऋषि ने यह लिखा है की वेद अति विशेष ईश्वरीय महाकाव्य है?
  1. आपने अपनी टिप्पणी में लिखा है की वेद और योग दोनों का महत्व विशेष रूप से है |
  • क्या वेद और योग पृथक हैं? जबकि आप अपनी टिप्पणी में लिख रहे हैं की योग वेद में वर्णित हैं |
  1. फिर आप लिखते हैं की वेद और योग दोनों विषय भिन्न हैं |
  • क्या दो विरोधी वाक्य सही हो सकतें हैं?
  1. लेखक ने योग को परमात्मा और आत्मा का मिलन लिखा है |
  • क्या व्यापक और व्याप्य होने से परमात्मा और आत्मा मिले हुए नहीं हैं ? दोनों की सत्ता अलग है पर सर्वव्यापक होने से परमात्मा आत्मा में भी है |
  1. लेखक ने योग साधना के मुख्य दो भेद बताएं हैं – राजयोग और हठयोग |
  • महर्षि दयानन्द ने हठयोग वर्जित किया है (देखिये सत्यार्थ प्रकाश तृतीय सम्मुल्लास)|
  1. लेखक ने हठयोग को राजयोग का पूरक लिखा है |
  • क्या महर्षि पातंजलि, व्यास और दयानन्द को योग दर्शन में अपूर्णता नहीं दिखी (जो की लेखक को दिख गयी) |
  1. योगानां राजा राजयोग: |
  • किस ऋषि ने लिखा है प्रमाण दीजिये |
  1. लेखक ने हठयोग के लिए लिखा है की यह राजयोग की पूरक पद्धति है | इसमें आसान, प्राणायाम और षट्कर्म को अधिक महत्व दिया गया है |
  • क्या राजयोग में प्राणायाम के बिना चित निरोध किया जा सकता है?
  1. लेखक ने हठयोग प्रदीपिका का उदहारण देते हुए हठयोग को राजयोग की सिद्धि की सीडी कहा है |
  • हठयोग प्रदीपिका निषिद्ध है (देखिये सत्यार्थ प्रकाश तृतीय सम्मुल्लास)|
  1. धारणा का सूत्र और अर्थ गलत दिया गया है |
  • विभुतिपाद का पहला सूत्र है “देशबन्धश्चित्तस्य धारणा” न की “देश्बन्धश्चित्त्स्याणाम्”| सहि अर्थ है – “देह को किसी अंगविशेष में बांध देना धारणा है” | लेखक के अनुसार किसी विशेष स्थान या बिन्दु पर केन्द्रित करना नहीं क्यों की इससे मूर्तिपूजा की पुष्टि हो सकती है |

इस सम्पूर्ण लेख में ऋषि विरोध मिलता है | आशा करता हूँ की आप मेरी शंकाओ का समाधान करेंगे अथवा अगले अंक में क्षमा याचना करते हुए यह लेख वापस ले लेंगे | मिथ्या ज्ञान से कभी मानवता की वृद्धि नहीं हो सकती किंतु केवल ह्रास ही हो सकता है |

 

ऋषि भक्त और आर्य समाज का सेवक,

प्रशांत शर्मा

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