क्या श्री राम दीवाली के दिन वनवास से अयोध्या लोटे थे ?

29 Oct

आज फिर कार्तिक अमावस्या आ गयी है | ३० अक्तूबर २०१६ ईस्वी या कार्तिक कृष्ण पक्ष १५ सन् २०७३ विक्रम संवत | आज विश्व भर में दीवाली पर्व की खुशियाँ मनाई जायेंगी; असंख्य दीपकों द्वारा अँधेरे पर उजाले की विजय घोषित की जाती है | आज ही के दिन १८८३ ईस्वी या १९४० विक्रम को, मंगलवार के दिन, सायंकाल के ६ बजे, भारत के राजस्थान प्रान्त के अजमेर जिले में  महान समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने नश्वर शरीर से महाप्रस्थान किया था | सत्य उजाले का प्रतीक है और असत्य अँधेरे का | मनुष्यों को उचित है कि वे सर्वदा सत्य का ग्रहण करें और असत्य का त्याग |

जब दीवाली की बात होती है तो श्री राम के वनवास से लौटने की बात भी होती है | आइये विचार करें कि यह कहाँ तक सत्य है |

यह तो पाठकों को विदित होगा कि श्री राम के राज्याभिषेक का अनुमोदन परिषद् ने चैत्र मास में किया था | वाल्मीकि रामयाण के अयोध्या काण्ड के तृतीयः सर्ग के चोथे श्लोक में महाराज दशरथ ने नगर और जनपद के प्रमुख लोगों के समक्ष वसिष्ठ और वामदेव आदि ब्राह्मणों से कहा “ यह चैत्र मास बड़ा सुन्दर और पवित्र है, इसमें सारे वन – उपवन खिल उठे हैं; अतः इस समय श्रीराम का युवराज पद पर अभिषेक करने के लिये आप लोग सब सामग्री एकत्र कराइये” |

पाठकों को यह भी विदित होगा की जिस दिन श्री राम का अभिषेक होना था उसके दूसरे ही दिन उन्हें वनवास जाना पड़ा | पाठकगण यह भी जान लें कि चैत्र मास मार्च और अप्रैल में होता है |

अयोध्याकाण्ड में ही महात्मा भरत श्री राम के वापस लोटने और राज्य करने के आदेश पर कहते हैं “रघुकुलशिरोमणे ! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर नूतन वर्ष के प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा” |

पाठकों को यह विदित होवे कि श्री राम और श्री भरत दोनों ही सत्यवादी थे और दो विरोधी बातें नहीं करते थे |

पाठकगण स्वयं ही निश्चय कर लें कि चैत्र के गए हुवे का वर्ष चैत्र में ही पूर्ण होगा न की कार्तिक को | अब अगर श्री राम का आगमन चैत्र के बजाये कार्तिक में होता है तो दो बातें हो सकती हैं:

  1. श्री राम चौदह वर्षों कि समाप्ति से पहले आ गए – चैत्र से ६ महीने पहले तेरहवें वर्ष के कार्तिक में या
  2. श्री राम चौदह वर्षों कि समाप्ति के ६ महीने बाद आये – चैत्र से ६ महीने बाद चौदहवें वर्ष में |

पहले दृष्टान्त में श्री राम झूठे हो जाते हैं क्योंकि वे चौदह वर्ष से पहले आ गये और दूसरे में श्री भरत क्योंकि उन्होंने अपने आप को अग्नि में भस्म नहीं किया | सत्य तो यह है की श्री राम का अयोध्या आगमन चैत्र मास में ही हुआ था |

युद्धकाण्ड में श्री राम की अयोध्या वापसी में महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उतरने के वृतांत में वाल्मीकि रामायण कहती है – “चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भरद्वाज आश्रम पहुंचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया “ |

यहां पर शंका होती है कि किस मास की पंचमी ? इसका समाधान यह है की मास बताये बिना तिथि बताई जाये तो प्रथम मास की जननी चाहिये – अर्थात् चैत्र की पंचमी |

ऊपर दिये हुए तर्क और प्रमाणों से सिद्ध होता है कि श्री राम का अयोध्या आगमन दीवाली के दिन नहीं हुआ था |

दीवाली पर लक्ष्मी पूजन की भी प्रथा है और कोई लोग नारायण और लक्ष्मी का अर्थ परमेश्वर और उसकी कृपा लेते हैं | आइये महर्षि दयानंद के सत्यार्थ प्रकाश द्वारा उनका अर्थ जाने |

महर्षि प्रथम समुल्लास में अर्थ देते हैं –

नारायण – जल और जीवों का नाम नारा है, वे अयन अर्थात् निवासस्थान हैं जिसका इसलिये सब जीवों में व्यापक परमात्मा का नाम नारायण है |

लक्ष्मी – जो सब चराचर जगत् को देखता, चिह्नित अर्थात् दृश्य बनाता, जैसे शरीर के नेत्र, नासिका और वृक्ष के पत्र, पुष्प, फल, मूल, पृथिवी, जल के कृष्ण, रक्त, श्वेत, मृत्तिका, पाषाण, चन्द्र, सूर्य्यादी चिह्न बनाता तथा सब को देखता, सब शोभाओं की शोभा और जो वेदादि शास्त्र वा धार्मिक विद्वान् योगियों का लक्ष्य अर्थात् देखने योग्य है इससे परमेश्वर का नाम लक्ष्मी है |

दीवाली की शुभ कामनाओं के साथ पाठकों से मेरा निवेदन है की जिस तरह आज उजाला अँधेरे पर हावी पड़ रहा उसी तरह आप भी सत्य को ग्रहण करके असत्य का त्याग करिये | महर्षि दयानन्द द्वारा हमें शिक्षा रुपी जो मणि मिले उससे हम अपने जीवन का उत्थान करें | ऋषि शिक्षा को अपने आचरण में लायें केवल बातों से जीवन नहीं सुधरता | जो निकले हुए सूर्य को देखते हुए भी नकारता है उसे विद्वान् नहीं कहा जाता है| आज आर्य समाज के कई आचार्य एवं शिक्षक स्वार्थ वश हठ योग आदि ऋषि विरुद्ध क्रियाओं का प्रचार कर रहें है | मेरी इन विद्वानों से प्रार्थना है की वे ऋषिओं की पद्धति को ही अपनायें एवं मानव मात्र को शिक्षित करें |

—– पंडित प्रशांत शर्मा

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