Archive | September, 2017

क्रियायोग की निरुक्ति

5 Sep

क्रियायोग की निरुक्ति

आज संसार में क्रियायोग के नाम पर कई मिथ्या क्रियाएँ प्रचलित हैं | आर्य समाज भी इन भ्रांतियों से अलिप्त नहीं रहा | ऋषियों की शिक्षा को छोड़ कर हम विकास वाद के नाम पर गलत दिशाओं में प्रस्थान करते जा रहें हैं | यह लेख मेरे द्वारा एक छोटा सा प्रयत्न है कि आम मनुष्य को क्रियायोग और प्रचलित हठ योग में अंतर दिख जाये | पाठकों से निवेदन है कि पूरा लेख पढ़ने के बाद ही अपना निष्कर्ष निकालें |

प्रश्न: क्रियायोग कि परिभाषा क्या है ?
उत्तर: महर्षि पातञ्जल योग दर्शन में कहते हैं:
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः | २/१
तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग नामक बहिरङ्ग साधन है |
तप – भूख-प्यास, शीत-उष्ण, सुख-दु:ख, स्थान-आसन, काष्ठ मौन-आकार-मौनादि द्वन्दों का सहना और कृच्छ्रचांद्रयाणादि व्रतों का शक्ति के अनुसार अनुष्ठान करना तप कहलाता है |
स्वाध्याय – प्रणव(ओ३म्) आदि पवित्र वचनों और मन्त्रों का जप करना तथा मोक्ष-शास्त्रों का पढ़ना स्वाध्याय कहलाता है |
ईश्वरप्रणिधान – साधक को अपने समस्त कर्मों को परमेश्वर के अर्पण करके उनके फल की इच्छा का भी त्याग कर देना अर्थात् संपूर्ण आत्मसमर्पण |

प्रश्न: क्या अनुलोम – विलोम, भास्त्रिका, कपाल भाती आदि प्राणायाम नहीं हैं?
उत्तर: ये ऋषियों द्वारा प्रणीत न होने के कारण त्याज्य हैं |

प्रश्न: प्राणायाम की सही विधि क्या है ?
उत्तर: महर्षि पातञ्जल योग दर्शन (१/३४, २/४९-५१), महर्षि व्यास योग दर्शन के भाष्य में और महर्षि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में निम्न विधि बतलाते हैं :
जैसे अत्यंत वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे | जब बाहर निकालना चाहे तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे | जब तक मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तब तक प्राण बाहर रहता है | इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है | जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को लेके फिर भी वैसे ही करता जाए जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (ओ३म्) इसका जप करता जाए | इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है |
बाह्यविषय – अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना |
आभ्यन्तर – अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाए उतना रोक के |
स्ताम्भ्वृति – अर्थात् एक ही बार जहाँ का तहाँ प्राण को यथाशक्ति रोक देना |
बाहयाभ्यन्तराक्षेपी – अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाए | ऐसे एक-दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुककर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं | बल-पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है | इससे मनुष्य शरीर में वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा | स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे” |

प्रश्न: कई आर्य समाजी कहते हैं कि प्राणायाम के लिए तो महर्षि दयानंद द्वारा प्रदत्त विधि ही सही है पर हम क्रिया करवा रहें है | इसी प्रकार वे हठ योग करते और करवाते हैं |
उत्तर: अपनी अज्ञानता और स्वार्थवश ये आर्य समाजी भोली भली जनता को छलते हैं | हठ योग किसी भी ऋषि द्वारा प्रदत्त नहीं है | ऋषि की परिभाषा आप मेरे “क्या ऋषियों में विरोध होता है?” ब्लॉग में पढ़ ले | महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में हठ योग को वर्जित किया है |

प्रश्न: कुछ आर्य समाजी कहते हैं कि महर्षि दयानंद ने हठ योग बाबाओं को धन कमाने से रोकने के लिए वर्जित किया है |
उत्तर: ये उनका भ्रम है क्यों कि ऋषि समस्त मानवता का होता है और पक्षपात रहित होता है | वह केवल किसी मत या समुदाय के लिए कार्य नहीं करता है अपितु समस्त मानवता के उत्थान के लिए कार्य करता है | पाठक गण ऋषि की परिभाषा मेरे “क्या ऋषियों में विरोध होता है?” ब्लॉग में पढ़ ले|

प्रश्न: क्या हठ योग राज योग का पूरक नहीं है?
उत्तर: पाठक गण मेरे “आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली को शंका समाधान पत्र” (जिसका उत्तर आज तक नहीं आया) ब्लॉग में उत्तर पढ़ ले|

प्रश्न: हठ योग के बिना शरीर में शक्ति कहाँ से आयेगी?
उत्तर: महर्षि पतञ्जलि योग दर्शन (३/२४) में हाथी आदि के तुल्य बल की प्राप्ति बताई है | महर्षि दयानन्द के जीवन के कई वृतांत इसकी पुष्टि करते हैं |

प्रश्न: हठ योग करने में हानि ही क्या है? महर्षि दयानन्द द्वारा इसका विरोध क्यों?
उत्तर: हठ योग में हठ पूर्वक और बलात क्रिया की जाती है | पाठक गण यह जान ले कि हठ से कभी भला नहीं होता है | महर्षि व्यास अपने योग भाष्य में बताते हैं कि योग अनुष्ठान अगर अपनी शक्ति का अतिक्रमण करके होता है तो इससे धातुओं में वैषम्य हो जाता है और अनेक रोगों से शरीर दूषित हो जाता है | महर्षि दयानंद ने केवल मनुष्य के उत्थान की बातें बतायी हैं और पतन का विरोध किया है |

प्रश्न: देखने में तो आता है कि हठ योग वाले बलिष्ठ होते जाते हैं |
उत्तर: जैसे स्टेरॉयड (steroid) लेने वाले बॉडी बिल्डरस (body builders) की मांसपेशियाँ शुरुआत में अच्छी लगती हैं पर आगे जीवन में हानिकारक होती हैं; वैसे ही हठ योग आने वाले समय में हानि करता है |

प्रश्न: हठ योग न करेंगे तो आसन कैसे सीखेंगे? क्योंकि अष्टांग योग में आसन, योग का एक अंग है |
उत्तर: महर्षि पातञ्जलि योग दर्शन (२/४६) और महर्षि दयानंद ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना काण्ड में बताते हैं कि “जिसमें सुखपूर्वक शरीर और आत्मा स्थिर हों, उसको आसन कहते हैं” | महर्षि व्यास ने २/४६ सूत्र के भाष्य में पद्मासन, भद्रासन, स्वस्तिकासन, दण्डासन आदि आसन स्थिर तथा सुख देने वाले बताएं हैं |

प्रश्न: हठ योग प्रदीपिका में भी तो ऊपर दिये आसन बताये गयें हैं और आर्य समाज तो अपने सम्मेलनों में हठ योग प्रदीपिका बेचता है (आर्य प्रतिनिधि सभा ऑस्ट्रेलिया द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महा सम्मेलन २०१५ में बिकने वाली पुस्तक सूचि में हठ योग प्रदीपिका भी सम्मिलित थी और रोज हठ योग कराया गया था) |
उत्तर: हठ योग प्रदीपिका में ऊपर दिये आसनों के अलावा और भी कई आसन है जो कि ऋषियों द्वारा प्रतिपादित नहीं हैं | जैसा कि ऊपर लिखा है कि अपनी अज्ञानता और स्वार्थवश ये आर्य समाजी भोली भली जनता को छलते हैं और हठ योग कराते हैं |

प्रश्न: क्या हठ योग प्रदीपिका में कुछ भी सत्य नहीं है?
उत्तर: महर्षि दयानंद सरस्वती जी अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के तृतीयसमुल्लास में असत्य ग्रंथों के लिए लिखते हैं “थोडा सत्य तो है परन्तु इसके साथ बहुत सा असत्य भी है इससे ‘विषसंप्रक्तान्नवत् त्याज्या:’ जैसे अत्युत्तम अन्न विष से युक्त होने से छोड़ने योग्य होता है वैसे ये ग्रन्थ हैं” |

पाठकों से निवेदन है मेरे इस लेख को मेरे तात्पर्य के अनुकूल ही समझें विपरीत नहीं | मेरी आकांक्षा किसी का अपमान या उसके मत को चोट पहुंचाने कि नहीं है; अपितु पाठकों को सत्य से अवगत कराने कि है | मानवता का उत्थान वेदों और उसपर आधारित आर्ष ग्रंथों के बिना संभव नहीं है | मेरी सब से यही प्रार्थना है कि हम असत्य को छोड़ कर सत्य को ही अपनाएं | आज भी ऐसे कई विद्वान हैं जो ऋषियों द्वारा प्रदत्त सत्य मार्ग का प्रचार प्रसार करते हैं |

—– पंडित प्रशान्त शर्मा

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