क्रियायोग की निरुक्ति

5 Sep

क्रियायोग की निरुक्ति

आज संसार में क्रियायोग के नाम पर कई मिथ्या क्रियाएँ प्रचलित हैं | आर्य समाज भी इन भ्रांतियों से अलिप्त नहीं रहा | ऋषियों की शिक्षा को छोड़ कर हम विकास वाद के नाम पर गलत दिशाओं में प्रस्थान करते जा रहें हैं | यह लेख मेरे द्वारा एक छोटा सा प्रयत्न है कि आम मनुष्य को क्रियायोग और प्रचलित हठ योग में अंतर दिख जाये | पाठकों से निवेदन है कि पूरा लेख पढ़ने के बाद ही अपना निष्कर्ष निकालें |

प्रश्न: क्रियायोग कि परिभाषा क्या है ?
उत्तर: महर्षि पातञ्जल योग दर्शन में कहते हैं:
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः | २/१
तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग नामक बहिरङ्ग साधन है |
तप – भूख-प्यास, शीत-उष्ण, सुख-दु:ख, स्थान-आसन, काष्ठ मौन-आकार-मौनादि द्वन्दों का सहना और कृच्छ्रचांद्रयाणादि व्रतों का शक्ति के अनुसार अनुष्ठान करना तप कहलाता है |
स्वाध्याय – प्रणव(ओ३म्) आदि पवित्र वचनों और मन्त्रों का जप करना तथा मोक्ष-शास्त्रों का पढ़ना स्वाध्याय कहलाता है |
ईश्वरप्रणिधान – साधक को अपने समस्त कर्मों को परमेश्वर के अर्पण करके उनके फल की इच्छा का भी त्याग कर देना अर्थात् संपूर्ण आत्मसमर्पण |

प्रश्न: क्या अनुलोम – विलोम, भास्त्रिका, कपाल भाती आदि प्राणायाम नहीं हैं?
उत्तर: ये ऋषियों द्वारा प्रणीत न होने के कारण त्याज्य हैं |

प्रश्न: प्राणायाम की सही विधि क्या है ?
उत्तर: महर्षि पातञ्जल योग दर्शन (१/३४, २/४९-५१), महर्षि व्यास योग दर्शन के भाष्य में और महर्षि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में निम्न विधि बतलाते हैं :
जैसे अत्यंत वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे | जब बाहर निकालना चाहे तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे | जब तक मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तब तक प्राण बाहर रहता है | इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है | जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को लेके फिर भी वैसे ही करता जाए जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (ओ३म्) इसका जप करता जाए | इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है |
बाह्यविषय – अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना |
आभ्यन्तर – अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाए उतना रोक के |
स्ताम्भ्वृति – अर्थात् एक ही बार जहाँ का तहाँ प्राण को यथाशक्ति रोक देना |
बाहयाभ्यन्तराक्षेपी – अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाए | ऐसे एक-दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुककर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं | बल-पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है | इससे मनुष्य शरीर में वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा | स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे” |

प्रश्न: कई आर्य समाजी कहते हैं कि प्राणायाम के लिए तो महर्षि दयानंद द्वारा प्रदत्त विधि ही सही है पर हम क्रिया करवा रहें है | इसी प्रकार वे हठ योग करते और करवाते हैं |
उत्तर: अपनी अज्ञानता और स्वार्थवश ये आर्य समाजी भोली भली जनता को छलते हैं | हठ योग किसी भी ऋषि द्वारा प्रदत्त नहीं है | ऋषि की परिभाषा आप मेरे “क्या ऋषियों में विरोध होता है?” ब्लॉग में पढ़ ले | महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में हठ योग को वर्जित किया है |

प्रश्न: कुछ आर्य समाजी कहते हैं कि महर्षि दयानंद ने हठ योग बाबाओं को धन कमाने से रोकने के लिए वर्जित किया है |
उत्तर: ये उनका भ्रम है क्यों कि ऋषि समस्त मानवता का होता है और पक्षपात रहित होता है | वह केवल किसी मत या समुदाय के लिए कार्य नहीं करता है अपितु समस्त मानवता के उत्थान के लिए कार्य करता है | पाठक गण ऋषि की परिभाषा मेरे “क्या ऋषियों में विरोध होता है?” ब्लॉग में पढ़ ले|

प्रश्न: क्या हठ योग राज योग का पूरक नहीं है?
उत्तर: पाठक गण मेरे “आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली को शंका समाधान पत्र” (जिसका उत्तर आज तक नहीं आया) ब्लॉग में उत्तर पढ़ ले|

प्रश्न: हठ योग के बिना शरीर में शक्ति कहाँ से आयेगी?
उत्तर: महर्षि पतञ्जलि योग दर्शन (३/२४) में हाथी आदि के तुल्य बल की प्राप्ति बताई है | महर्षि दयानन्द के जीवन के कई वृतांत इसकी पुष्टि करते हैं |

प्रश्न: हठ योग करने में हानि ही क्या है? महर्षि दयानन्द द्वारा इसका विरोध क्यों?
उत्तर: हठ योग में हठ पूर्वक और बलात क्रिया की जाती है | पाठक गण यह जान ले कि हठ से कभी भला नहीं होता है | महर्षि व्यास अपने योग भाष्य में बताते हैं कि योग अनुष्ठान अगर अपनी शक्ति का अतिक्रमण करके होता है तो इससे धातुओं में वैषम्य हो जाता है और अनेक रोगों से शरीर दूषित हो जाता है | महर्षि दयानंद ने केवल मनुष्य के उत्थान की बातें बतायी हैं और पतन का विरोध किया है |

प्रश्न: देखने में तो आता है कि हठ योग वाले बलिष्ठ होते जाते हैं |
उत्तर: जैसे स्टेरॉयड (steroid) लेने वाले बॉडी बिल्डरस (body builders) की मांसपेशियाँ शुरुआत में अच्छी लगती हैं पर आगे जीवन में हानिकारक होती हैं; वैसे ही हठ योग आने वाले समय में हानि करता है |

प्रश्न: हठ योग न करेंगे तो आसन कैसे सीखेंगे? क्योंकि अष्टांग योग में आसन, योग का एक अंग है |
उत्तर: महर्षि पातञ्जलि योग दर्शन (२/४६) और महर्षि दयानंद ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना काण्ड में बताते हैं कि “जिसमें सुखपूर्वक शरीर और आत्मा स्थिर हों, उसको आसन कहते हैं” | महर्षि व्यास ने २/४६ सूत्र के भाष्य में पद्मासन, भद्रासन, स्वस्तिकासन, दण्डासन आदि आसन स्थिर तथा सुख देने वाले बताएं हैं |

प्रश्न: हठ योग प्रदीपिका में भी तो ऊपर दिये आसन बताये गयें हैं और आर्य समाज तो अपने सम्मेलनों में हठ योग प्रदीपिका बेचता है (आर्य प्रतिनिधि सभा ऑस्ट्रेलिया द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महा सम्मेलन २०१५ में बिकने वाली पुस्तक सूचि में हठ योग प्रदीपिका भी सम्मिलित थी और रोज हठ योग कराया गया था) |
उत्तर: हठ योग प्रदीपिका में ऊपर दिये आसनों के अलावा और भी कई आसन है जो कि ऋषियों द्वारा प्रतिपादित नहीं हैं | जैसा कि ऊपर लिखा है कि अपनी अज्ञानता और स्वार्थवश ये आर्य समाजी भोली भली जनता को छलते हैं और हठ योग कराते हैं |

प्रश्न: क्या हठ योग प्रदीपिका में कुछ भी सत्य नहीं है?
उत्तर: महर्षि दयानंद सरस्वती जी अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के तृतीयसमुल्लास में असत्य ग्रंथों के लिए लिखते हैं “थोडा सत्य तो है परन्तु इसके साथ बहुत सा असत्य भी है इससे ‘विषसंप्रक्तान्नवत् त्याज्या:’ जैसे अत्युत्तम अन्न विष से युक्त होने से छोड़ने योग्य होता है वैसे ये ग्रन्थ हैं” |

पाठकों से निवेदन है मेरे इस लेख को मेरे तात्पर्य के अनुकूल ही समझें विपरीत नहीं | मेरी आकांक्षा किसी का अपमान या उसके मत को चोट पहुंचाने कि नहीं है; अपितु पाठकों को सत्य से अवगत कराने कि है | मानवता का उत्थान वेदों और उसपर आधारित आर्ष ग्रंथों के बिना संभव नहीं है | मेरी सब से यही प्रार्थना है कि हम असत्य को छोड़ कर सत्य को ही अपनाएं | आज भी ऐसे कई विद्वान हैं जो ऋषियों द्वारा प्रदत्त सत्य मार्ग का प्रचार प्रसार करते हैं |

—– पंडित प्रशान्त शर्मा

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4 Responses to “क्रियायोग की निरुक्ति”

  1. माधव दास December 15, 2017 at 1:49 pm #

    हठ योग में हठ का अर्थ जिद या जबरदस्ती नहीं है| हठ योग ऊर्जा तंत्र या प्राण तंत्र पर कार्य करता है| इसमें ‘ह’ का अर्थ बाएं भाग के चन्द्र स्वर और ‘ठ’ का अर्थ दायें भाग के सूर्य स्वर से है| इन दोनों ऊर्जा मार्गों के मध्य संतुलन के लिए जो शारीरिक क्रिया की जाती हैं उन्हें हठ योग कहते हैं| ये क्रियाएँ कई स्तर की होती हैं जिनके अपने अपने लाभ होते हैं| व्यक्ति अपने लक्ष्य के अनुसार भी इन क्रियाओं को चुन सकता है| चूंकि ये क्रियाएं प्रैक्टिकल होती हैं इसीलिए इन्हें किसी कुशल शिक्षक के सान्निध्य में सीखना होता है| आपको किसी बात का ज्ञान नहीं यह अलग बात है किन्तु बिना अनुभव के उसे नकार देना बुद्धिमानों का व्यवहार नहीं होता|

    • Prashant Sharma December 15, 2017 at 10:07 pm #

      नमस्ते माधव जी,
      आपके उत्तर के लिए हार्दिक धन्यवाद| यह आपको विदित होये कि किसी भी ऋषि मैं विरोध नहीं होता है क्योंकि ऋषि अपनी आत्मा में उत्पन्न ईश्वरीय ज्ञान द्वारा ही मानवता को शिक्षा देता है | हाँ यह संभव है कि पक्षपात से भरा आम मनुष्य उसका गलत अर्थ निकाल ले | इसीलिए जो कुछ भी आम मनुष्य बताये व अपनाये वो ऋषि प्रदत्त होना चाहिए | मेरे लेख ऋषि प्रमाणों के साथ लिखा गया है और मानवता को सत्य से अवगत करने के उद्देश्य से लिखा गया है |
      आप कहते हैं कि “ये क्रियाएं प्रैक्टिकल होती हैं” तो मुझे समझा दें कि क्या उपासना प्रैक्टिकल नहीं होती हैं या पातंजलि, व्यास और दयानंद जैसे ऋषियों को practicality नहीं आती थी? आप कहते हैं के मुझे “किसी बात का ज्ञान नहीं” तो यह आपको विदित होये कि मैं योगी नहीं हूँ और ऋषियों के प्रमाण को ही सत्य मानता हूँ | आपसे प्रार्थना है कि आप ऋषि प्रमाण द्वारा हठ योग सिद्ध कर दें | हठ योग को महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और अपने प्रवचन में निषेध किया है | आप आगे लिखते हैं कि “किन्तु बिना अनुभव के उसे नकार देना बुद्धिमानों का व्यवहार नहीं होता” तो मैं आपसे पूछता हूँ कि जैसे यह प्रमाणित है कि ऊंचे पर्वत से किसी गहरी खाई में कूदने से प्राणों का अंत संभव है तो क्या अनुभव के लिए आम आदमी कूद के देखे? आर्य जगत के प्रगाड़ विद्वान आचार्य विशुद्धानंद जी मिश्र का कथन था कि “नित्य प्राणायाम करने वाले को कभी heart attack नहीं होता” | आज आप वर्तमान के कई हठयोगियों का ही उदहारण ले लें जो कि के ह्रदय रोगों से ग्रस्त हैं |
      आप से प्रार्थना करता हूँ कि आप आर्ष ग्रंथों के प्रमाणों द्वारा हठयोग सिद्ध करें और मेरा मार्गदर्शन करें; अन्यथा ऋषि सिद्धांतों को अपनाते हुए हठयोग को त्याग दें क्योंकि ऋषि साक्षात्कृतधर्मा तथा आप्तपुरुष होने से असत्य तथा भ्रान्त उल्लेख कभी नहीं करते हैं | बुद्धिमान मनुष्य मानवता उत्थान के मार्ग को ही अपनाते हैं न कि अन्यत्र को | धन्यवाद |

      • माधव दास December 16, 2017 at 8:02 am #

        नमस्ते प्रशांत जी! ऋषियों में विरोध नहीं होता यह बात सही है किन्तु यह भी सही है कि मनुष्य अल्पज्ञ है, सर्वज्ञ नहीं| ऋषि स्वयं ईश्वर नहीं है| ईश्वर की बनायी हुई यह सृष्टि अनंत है और उसी प्रकार उसकी विद्याएँ भी| ऋषि दयानंद जी को ही लें तो जिन आर्ष ग्रंथों का उन्होंने उल्लेख किया है उनमें यदि दर्शनों को देखें तो एक ही तत्त्व को देखने के भिन्न दृष्टिकोण ऋषियों द्वारा दिखाए गए हैं| जिस प्रकार इन ऋषियों के ज्ञान को आप विरोधाभास नहीं कहते, उसी प्रकार हम ईश्वर की अनंत सृष्टि में स्थित किसी सम्भावना को यह कहकर नहीं नकार सकते कि अमुक व्यक्ति इसे नहीं मानता था| ग्रंथों में मिलावट पूरी तरह संभव है लेकिन यह भी जान रखिये कि उनमें कई ऐसी बातें हो सकती हैं जिनका अस्तित्व है और जिनके कारण बीज भूतकाल में रहे हों तथा कालांतर में विलुप्त हो गए हों| जैसे विमान शास्त्र की विद्या| कोई पारे से विमान उड़ाने की बात कहे तो आज सब हसेंगे किन्तु इस पर शोध होना चाहिये कि नहीं?

        मुझे दुःख हुआ आपका संकीर्ण दृष्टिकोण जानकर| केवल बौद्धिक स्तर पर ही रहने वालों से अक्सर ऐसी भूल होती है| मैंने कहीं नहीं कहा कि उपासना प्रायोगिक नहीं है| मैं केवल बात योगिक क्रियाओं की कर रहा था जिन्हें बिना किये ही आप निष्कर्ष निकाल रहे हैं| ऋषि दयानंद प्रदत्त उपासना पद्धति को ही लें तो वह भी पूर्ण वैज्ञानिक है| यदि आपको मन्त्रों के अर्थ न पता हों तब भी आप उसका लाभ ले सकते हैं| यह बात भी मैं अनुभव के आधार पर ही कह रहा हूँ, तर्क के आधार पर नहीं| आप योगी नहीं हैं तो यह कोई महान बात नहीं है| आपको पहले योगी बनने के लिए प्रयास करना चाहिए, ऋषि आप अपने आप ही बन जायेंगे| बिना योग के कोई भी आज तक ऋषि न बन पाया है न बन पायेगा| ऐसे ही प्रमाणों को लेकर जीते रहने से न अपना कल्याण होता है न सामने वाले का| प्रमाण को जानकर ही संतुष्ट न रहना चाहिए| देखकर आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्रमाणों से नहीं अनुभव से ही मिलता है| आपका ज्ञान आपके मन मस्तिष्क की एक एक कोशिका में छपा होना चाहिए जो केवल समझने से प्राप्त नहीं होता बल्कि आचरण द्वारा होता है| प्रमाणों को लेकर इसी व्यवहार के कारण आज आर्य समाज आपस में ही बंट रखा है| आत्मा के स्तर तक न पहुँचते हुए, केवल बौद्धिक स्तर पर सांस्कारिक मलों के साथ जग सुधारने की जो होड़ रही है उसने आर्य समाज के बुरे दिन ला दिए हैं| संसार को छोड़ दें तो स्वयं आर्य समाजी ही उन बातों को करते पाए जाते हैं जिनका ऋषि विरोध करते थे| कुछ गलती इसमें स्वामी दयानंद की भी शायद रही या किंचित अल्प समय के कारण वे कर नहीं पाए होंगे| ऋषि दयानंद ने अपनी आत्मा, बुद्धि और शरीर को एक सीध में रखा हुआ था इसीलिए वे ऋषि बन गए किन्तु वे अपने अनुयायिओं को अपने भीतर झांकना शायद दृढ़ता से नहीं सिखा पाए यही कारण है कि आर्य समाज सिमट रहा है| सत्य सनातन वैदिक ज्ञान होते हुए भी सिमट रहा है| कहीं कुछ होने लगता है तो आर्य समाजी दूसरे आर्य समाजी को सहन नहीं कर पाता| आर्य निर्माण वाले आत्मा को साकार मानते हैं और उनके पास प्रमाण भी हैं अपने| यही हो रहा है आर्य समाज में| किसी को भीतर नहीं झांकना बस बहस करनी है| अनुभव के लिए आवश्यक नहीं कि आपको खाई में ही कूदना पड़े, ऐसे कई कार्य हैं जिन्हें बिना जान जोखिम में डाले आप कर सकते हैं| अगर कोई व्यक्ति गलत योग सिखा रहा है तो इसमें योगिक क्रिया की गलती है या सिखाने वाले की? आर्य समाजी जो छवि आर्य समाज की बना रहे हैं उसके लिए दोषी आर्य समाज और उसके सिद्धांत हैं या आर्य समाजी? अपने परिप्रेक्ष्य में जब आप एक तर्क लगाते हैं तो वही दूसरे परिप्रेक्ष्य में न सोचना पक्षपात ही तो है! ऋषि दयानंद ने जो प्राणायाम की विधि बताई है उसे आप गलत करेंगे तब भी प्राण संकट में पड़ सकते हैं तो इसमें गलती प्राणायाम की मानेंगे? मैंने स्वयं सूर्य क्रिया से जो शारीरिक, बौद्धिक और आत्मिक लाभ लिए हैं, वे मैं आपको शब्दों के माध्यम से नहीं समझा सकता| इसीलिए यदि सत्याग्रही आप हैं तो भय मत पालिए और यह जान रखिये कि स्वामी दयानंद या कोई भी पूर्ण विराम नहीं हैं| ईश्वर की अनंत सृष्टि में अभी बहुत कुछ है जिसे हम जान सकते हैं और यदि हम सच्चे हृदय से इच्छुक हैं तो हमारा वह परम गुरु परमेश्वर हमें आवश्यक ज्ञान के साधन सदैव उपलब्ध करवाता रहेगा| यदि आप अपनी बुद्धि को तर्क के सीमित दायरे में कैद रखेंगे तो आप बहुत ऊँची संभावनाओं से सदैव चूकते रहेंगे!

        तर्क और प्रमाण आदि सत्य असत्य का निर्णय करने में सहायक होते हैं किन्तु सत्य को अपनाया केवल अनुभव से ही जा सकता है| आप परमात्मा को तर्क द्वारा मानते हैं, क्या उन्हें जानते भी हैं? कोई अनुभव है आपके पास और यदि नहीं है तो आप में और नास्तिक में कोई अंतर नहीं है| बल्कि नास्तिक आपसे श्रेष्ठ है क्योंकि वह किसी कल्पना लोक में नहीं जी रहा है| श्री कृष्ण अर्जुन को योगी होने को क्यों कहते हैं बारम्बार? क्यों उन्होंने ने योगी को ज्ञानी से श्रेष्ठ कहा? इस उत्तर के साथ अगली चर्चा होगी आपसे|

        इति ॐ शं||

      • Pundit Prashant December 18, 2017 at 7:57 pm #

        नमस्ते माधव जी,

        यह सत्य है कि आत्मा अल्पज्ञ है इसीलिए ईश्वर को पूर्णतया नहीं जान सकती (कठ उपनिषद); परन्तु यह भी सत्य है कि ऋषि यथार्थ दृष्टा है – वह जो भी जानता है यथार्थ जानता है इसीलिए किसी ऋषि में विरोध नहीं होता है – ऋषियों ने जाना कि ईश्वर अनन्त है | रही दर्शनों कि बात तो उनमें भी विरोधाभास नहीं है – सत्यार्थ प्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में देख लीजिये | गीता भी जब योग कि बात करती है तो हठ योग कि नहीं अपितु अंत में ज्ञान द्वारा ही मोक्ष का रास्ता बताती है | यह भी सत्य है कि त्रिविध दुखों के निवारण हेतु विद्या और अविद्या दोनों को ही जानना परमावश्यक है (यजुर्वेद, वैशेषिक दर्शन)| यह भी सत्य है कि हमारे कई ग्रंथों में प्रक्षेपण है इसीलिए दृष्टा द्वारा ही यथार्थ ज्ञान मिल सकता है (ऋग्वेद १/१/२) | ऋषि या आप्त कि परिभाषा मैं अपने लेखों में दे चुका हूँ |

        मुझे आश्चर्य हुआ कि आप योग कि बात करते हैं और आपने मेरे विचारों को पूर्णतया जाने बिना मेरे संकीर्ण दृष्टिकोण का निष्कर्ष निकाल लिया ? आपने मुझे बिना जाने यह भी निष्कर्ष निकाला कि मैं केवल बौद्धिक स्तर पर हूँ और प्रैक्टिकल कुछ नहीं करता हूँ – इसे ऑस्ट्रेलिया में हम opinionated कहते हैं | आप यौगिक क्रियाओं कि बात करते हैं और मेरे लेख में दी हुई ऋषियों द्वारा प्रदत्त क्रियायोग की परिभाषा को नकारते हैं ? यह बात भी सत्य है कि महर्षि दयानन्द जी ऋषि होने के पूर्व हठ योग का अभ्यास करते थे – ऋषित्व पाने पर उन्होंने हठ योग निषेध किया – back to the definition of Rishi | ऋषियों को आप पूर्ण विराम भले ही न दे पर वे ईश्वर को प्राप्त कर चुके होते हैं | जो पा या कर चुका है वह ही रास्ता दिखायेगा – वह प्रमाणित है | आप ऋषियों को प्रमाण नहीं मानते पर ईश्वर वाणी वेद को तो प्रमाण मानते होंगे ? यदि हाँ तो आपसे निवेदन है कि वेद (या कोई भी आर्ष ग्रन्थ) से हठ योग का प्रमाण दे कर मेरा मार्ग प्रशस्त कीजिये |

        क्षमा चाहता हूँ कि मैंने “मैं योगी नहीं हूँ” को विस्तार पूर्वक नहीं समझाया – इससे मेरा तात्पर्य है कि मेरा योग पूर्णतया सिद्ध नहीं हुआ है – मुझे समाधि की प्राप्ति नहीं हुई है | ईश्वर का प्रत्यक्ष तो योगी (जिसने समाधि पा ली हो) ही करते हैं परन्तु हर मनुष्य अगर चाहे तो सृष्टि के कण-कण में, सृष्टि के नियमों में, प्राकृतिक वातावरण के एकांतवास आदि में ईश्वर कि सत्ता का अनुभव तो कर ही सकता है | आपने नास्तिकों को मुझसे श्रेष्ठ कहा है क्यों कि मुझे ईश्वर सिद्धि नहीं हुई है – क्या आपको हो गयी है ? अगर आप को हो गयी है तो आप यह जान ही गए होंगे कि किसी भी ऋषि और योगी मैं विरोध नहीं है – इसीलिए आप्तों को दर्शनों ने शब्द प्रमाणों में बताया है (योग, संख्या और न्याय)| अब रही आचरण कि बात तो आपको यह विदित होवे कि मेरा आचरण मेरे प्रवचनों कि तरह ही है – तर्क / वितर्क, प्रमाण आदि से सत्य कि परीक्षा कर के अपने आचरण में लाना – धर्म के लक्षणों को अपने जीवन में उतरना आदि | मेरे अपने मत में केवल किताबी कीड़ा बनना और उस ज्ञान को व्यवहार में न लाना जीवन व्यर्थ करना है |

        आर्य समाज तभी तक है जब तक वह आर्य सिद्धांतों पर चल रहा है अन्यथा वह एक संप्रदाय बन जाता है | हमारी ऑस्ट्रेलिया में एक कथनी है – We can argue till the cows come home without any result. यह भी हर एक की स्वतंत्रता है कि हर कोई अपनी राह चुन सकता है पर कर्मफल का प्रदाता ईश्वर है (यजुर्वेद, गीता)|

        क्षमा चाहता हूँ कि मैं वर्तमान (कुछ सप्ताहों के लिए) में दूसरे देश मैं हूँ और internet की असुविधा है – इसीलिए मेरी चर्चा में विलम्ब है | धन्यवाद |

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