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क्रियायोग की निरुक्ति

5 Sep

क्रियायोग की निरुक्ति

आज संसार में क्रियायोग के नाम पर कई मिथ्या क्रियाएँ प्रचलित हैं | आर्य समाज भी इन भ्रांतियों से अलिप्त नहीं रहा | ऋषियों की शिक्षा को छोड़ कर हम विकास वाद के नाम पर गलत दिशाओं में प्रस्थान करते जा रहें हैं | यह लेख मेरे द्वारा एक छोटा सा प्रयत्न है कि आम मनुष्य को क्रियायोग और प्रचलित हठ योग में अंतर दिख जाये | पाठकों से निवेदन है कि पूरा लेख पढ़ने के बाद ही अपना निष्कर्ष निकालें |

प्रश्न: क्रियायोग कि परिभाषा क्या है ?
उत्तर: महर्षि पातञ्जल योग दर्शन में कहते हैं:
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः | २/१
तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग नामक बहिरङ्ग साधन है |
तप – भूख-प्यास, शीत-उष्ण, सुख-दु:ख, स्थान-आसन, काष्ठ मौन-आकार-मौनादि द्वन्दों का सहना और कृच्छ्रचांद्रयाणादि व्रतों का शक्ति के अनुसार अनुष्ठान करना तप कहलाता है |
स्वाध्याय – प्रणव(ओ३म्) आदि पवित्र वचनों और मन्त्रों का जप करना तथा मोक्ष-शास्त्रों का पढ़ना स्वाध्याय कहलाता है |
ईश्वरप्रणिधान – साधक को अपने समस्त कर्मों को परमेश्वर के अर्पण करके उनके फल की इच्छा का भी त्याग कर देना अर्थात् संपूर्ण आत्मसमर्पण |

प्रश्न: क्या अनुलोम – विलोम, भास्त्रिका, कपाल भाती आदि प्राणायाम नहीं हैं?
उत्तर: ये ऋषियों द्वारा प्रणीत न होने के कारण त्याज्य हैं |

प्रश्न: प्राणायाम की सही विधि क्या है ?
उत्तर: महर्षि पातञ्जल योग दर्शन (१/३४, २/४९-५१), महर्षि व्यास योग दर्शन के भाष्य में और महर्षि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में निम्न विधि बतलाते हैं :
जैसे अत्यंत वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे | जब बाहर निकालना चाहे तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे | जब तक मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तब तक प्राण बाहर रहता है | इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है | जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को लेके फिर भी वैसे ही करता जाए जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (ओ३म्) इसका जप करता जाए | इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है |
बाह्यविषय – अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना |
आभ्यन्तर – अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाए उतना रोक के |
स्ताम्भ्वृति – अर्थात् एक ही बार जहाँ का तहाँ प्राण को यथाशक्ति रोक देना |
बाहयाभ्यन्तराक्षेपी – अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाए | ऐसे एक-दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुककर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं | बल-पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है | इससे मनुष्य शरीर में वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा | स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे” |

प्रश्न: कई आर्य समाजी कहते हैं कि प्राणायाम के लिए तो महर्षि दयानंद द्वारा प्रदत्त विधि ही सही है पर हम क्रिया करवा रहें है | इसी प्रकार वे हठ योग करते और करवाते हैं |
उत्तर: अपनी अज्ञानता और स्वार्थवश ये आर्य समाजी भोली भली जनता को छलते हैं | हठ योग किसी भी ऋषि द्वारा प्रदत्त नहीं है | ऋषि की परिभाषा आप मेरे “क्या ऋषियों में विरोध होता है?” ब्लॉग में पढ़ ले | महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में हठ योग को वर्जित किया है |

प्रश्न: कुछ आर्य समाजी कहते हैं कि महर्षि दयानंद ने हठ योग बाबाओं को धन कमाने से रोकने के लिए वर्जित किया है |
उत्तर: ये उनका भ्रम है क्यों कि ऋषि समस्त मानवता का होता है और पक्षपात रहित होता है | वह केवल किसी मत या समुदाय के लिए कार्य नहीं करता है अपितु समस्त मानवता के उत्थान के लिए कार्य करता है | पाठक गण ऋषि की परिभाषा मेरे “क्या ऋषियों में विरोध होता है?” ब्लॉग में पढ़ ले|

प्रश्न: क्या हठ योग राज योग का पूरक नहीं है?
उत्तर: पाठक गण मेरे “आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली को शंका समाधान पत्र” (जिसका उत्तर आज तक नहीं आया) ब्लॉग में उत्तर पढ़ ले|

प्रश्न: हठ योग के बिना शरीर में शक्ति कहाँ से आयेगी?
उत्तर: महर्षि पतञ्जलि योग दर्शन (३/२४) में हाथी आदि के तुल्य बल की प्राप्ति बताई है | महर्षि दयानन्द के जीवन के कई वृतांत इसकी पुष्टि करते हैं |

प्रश्न: हठ योग करने में हानि ही क्या है? महर्षि दयानन्द द्वारा इसका विरोध क्यों?
उत्तर: हठ योग में हठ पूर्वक और बलात क्रिया की जाती है | पाठक गण यह जान ले कि हठ से कभी भला नहीं होता है | महर्षि व्यास अपने योग भाष्य में बताते हैं कि योग अनुष्ठान अगर अपनी शक्ति का अतिक्रमण करके होता है तो इससे धातुओं में वैषम्य हो जाता है और अनेक रोगों से शरीर दूषित हो जाता है | महर्षि दयानंद ने केवल मनुष्य के उत्थान की बातें बतायी हैं और पतन का विरोध किया है |

प्रश्न: देखने में तो आता है कि हठ योग वाले बलिष्ठ होते जाते हैं |
उत्तर: जैसे स्टेरॉयड (steroid) लेने वाले बॉडी बिल्डरस (body builders) की मांसपेशियाँ शुरुआत में अच्छी लगती हैं पर आगे जीवन में हानिकारक होती हैं; वैसे ही हठ योग आने वाले समय में हानि करता है |

प्रश्न: हठ योग न करेंगे तो आसन कैसे सीखेंगे? क्योंकि अष्टांग योग में आसन, योग का एक अंग है |
उत्तर: महर्षि पातञ्जलि योग दर्शन (२/४६) और महर्षि दयानंद ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना काण्ड में बताते हैं कि “जिसमें सुखपूर्वक शरीर और आत्मा स्थिर हों, उसको आसन कहते हैं” | महर्षि व्यास ने २/४६ सूत्र के भाष्य में पद्मासन, भद्रासन, स्वस्तिकासन, दण्डासन आदि आसन स्थिर तथा सुख देने वाले बताएं हैं |

प्रश्न: हठ योग प्रदीपिका में भी तो ऊपर दिये आसन बताये गयें हैं और आर्य समाज तो अपने सम्मेलनों में हठ योग प्रदीपिका बेचता है (आर्य प्रतिनिधि सभा ऑस्ट्रेलिया द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महा सम्मेलन २०१५ में बिकने वाली पुस्तक सूचि में हठ योग प्रदीपिका भी सम्मिलित थी और रोज हठ योग कराया गया था) |
उत्तर: हठ योग प्रदीपिका में ऊपर दिये आसनों के अलावा और भी कई आसन है जो कि ऋषियों द्वारा प्रतिपादित नहीं हैं | जैसा कि ऊपर लिखा है कि अपनी अज्ञानता और स्वार्थवश ये आर्य समाजी भोली भली जनता को छलते हैं और हठ योग कराते हैं |

प्रश्न: क्या हठ योग प्रदीपिका में कुछ भी सत्य नहीं है?
उत्तर: महर्षि दयानंद सरस्वती जी अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के तृतीयसमुल्लास में असत्य ग्रंथों के लिए लिखते हैं “थोडा सत्य तो है परन्तु इसके साथ बहुत सा असत्य भी है इससे ‘विषसंप्रक्तान्नवत् त्याज्या:’ जैसे अत्युत्तम अन्न विष से युक्त होने से छोड़ने योग्य होता है वैसे ये ग्रन्थ हैं” |

पाठकों से निवेदन है मेरे इस लेख को मेरे तात्पर्य के अनुकूल ही समझें विपरीत नहीं | मेरी आकांक्षा किसी का अपमान या उसके मत को चोट पहुंचाने कि नहीं है; अपितु पाठकों को सत्य से अवगत कराने कि है | मानवता का उत्थान वेदों और उसपर आधारित आर्ष ग्रंथों के बिना संभव नहीं है | मेरी सब से यही प्रार्थना है कि हम असत्य को छोड़ कर सत्य को ही अपनाएं | आज भी ऐसे कई विद्वान हैं जो ऋषियों द्वारा प्रदत्त सत्य मार्ग का प्रचार प्रसार करते हैं |

—– पंडित प्रशान्त शर्मा

भोजन की प्रार्थना का शंका समाधान

5 Dec

भोजन की प्रार्थना का शंका समाधान

अन्नपतेSन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः |

प्रप्र दातारं तारिषऽ ऊर्ज्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे | यजु: ११/८३

पदार्थ: – हे (अन्नपते) औषधि अन्नों के पालन करनेहारे यजमान वा पुरोहित ! आप (नः) हमारे लिये (अनमीवस्य) रोगों के नाश से सुख को बढ़ाने (शुष्मिण:) बहुबलकारी (अन्नस्य) अन्न को (प्रप्रदेहि) अतिप्रकर्ष  के साथ दीजिये और इस अन्न के (दातारम्) देने हारे को (तारिष:)तृप्त कर तथा (नः) हमारे (द्विपदे) दो पग वाले मनुष्यादि तथा (चतुष्पदे) चार पगवाले गौ आदि पशुओं के लिये (उर्जम्) पराक्रम को (धेहि) धारण कर |

शंका : इस  मंत्र में केवल दो पैर और चार पैर वाले प्राणियों का ही विषय क्यों है ?

समाधान : इस मंत्र में मनुष्यों को इस संसार में कैसे-कैसे वर्त्तना इस विषय को कहा गया है | आइये महर्षि दयानन्द के वेद भाष्य से इसका भावार्थ लेते हैं –

भावार्थः – मनुष्यों को चाहिये कि सदैव बलकारी आरोग्य अन्न आप सेवें और दूसरों को देवें | मनुष्य तथा पशुओं के सुख और बल बढ़ावें | जिससे ईश्वर की सृष्टिक्रमानुकूल आचरण से सब के सुखों की सदा उन्नति होवे |

इस मंत्र में दो पैरों से मनुष्य जाती (humans) और चार पैरों से पशु जाती (animal kingdom) का तात्पर्य है | महर्षि दयानन्द ने गृहस्थों की हिंसा-दोष की निवृत्ति के लिये, गृहस्थों को प्रतिदिन पाँच महायज्ञों का विधान किया है | महर्षि मनु ने मनु स्मृति के ३/६८-७१ में चूल्हा, चक्की, झाड़ू, ओखली और जलकलश – ये पाँच गृहस्थों की हिंसा के मूल बतायें हैं |

महर्षि दयानन्द ने बलिवैश्वदेव यज्ञ में नित्य होम के बाद मनु स्मृति के ३/६२ को समझाते हुए कुत्तों, पतितों, चांडालों, कुष्टी आदि रोगियों, काक आदि पक्षियों और चींटी आदि कृमियों के लिये छः भाग अलग-अलग बाँट के दे देना और उनकी प्रसन्नता सदा करना बताया है |

चूँकि गृहस्थ मनुष्यों का कर्त्तव्य अन्य आश्रमों के साथ समस्त प्राणी मात्र की उन्नति कराना है; इसीलिए चार पैरों से पशु जाती का ग्रहण करना ही उचित है |

शंका : प्राणियों में तो वृक्ष भी आते हैं | उनका वर्णन इसमें क्यों नहीं है ?

समाधान : वृक्षों को नित्य होम द्वारा जल, वायु आदि की शुद्धि करते हुए दिया जाता है | नित्य होम समस्त प्राणियों के लिये उत्तम हैं जो उनको आरोग्य, बल, बुद्धि आदि प्राप्त कराते हैं |

—– पंडित प्रशांत शर्मा

आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली को शंका समाधान पत्र

29 Oct

यह ब्लॉग केवल मेरे पिछले ब्लॉग (क्या श्री राम दीवाली के दिन वनवास से अयोध्या लोटे थे?) के निष्कर्ष के प्रमाण में है | इस भेजे हुए पत्र का आज तक मुझे उत्तर नहीं दिया गया है और न ही उत्तर मिलने की आशा है | मेरा उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं है| मेरा उद्देश्य केवल मानव में जागरण की भावना लाना है | मेरे इस ब्लॉग को इसी भाव से देखें और लेवें | यह पत्र २४ दिसम्बर २०१२ में प्रकाशित आर्य सन्देश के ऊपर लिखा गया था | यह पत्र भेजने की तिथि १९ जनवरी २०१३ है |

 

आदरणीय सम्पादक महोदय,

नमस्ते,

 

में आपका और दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का आर्य सन्देश के लिये हार्दिक धन्यवाद करता हूँ | मानव जीवन के सुधार के लिए ऋषिओं का दिखाया गया मार्ग अनिवार्य है |

 

आर्य सन्देश वर्ष ३६, अंक ७ में डॉ. भारतेन्दु जी का वेद और योग पड़कर मन में कुछ शंकाएं उपस्तिथ हुईं सो नीचे लिख रहा हूँ | आशा करता हूँ कि उनका समाधान होगा |

  1. आपने अपनी टिप्पणी में वेद को अति विशेष ईश्वरीय महाकाव्य कहा है |
  • कृपया प्रमाण दें की किस ऋषि ने यह लिखा है की वेद अति विशेष ईश्वरीय महाकाव्य है?
  1. आपने अपनी टिप्पणी में लिखा है की वेद और योग दोनों का महत्व विशेष रूप से है |
  • क्या वेद और योग पृथक हैं? जबकि आप अपनी टिप्पणी में लिख रहे हैं की योग वेद में वर्णित हैं |
  1. फिर आप लिखते हैं की वेद और योग दोनों विषय भिन्न हैं |
  • क्या दो विरोधी वाक्य सही हो सकतें हैं?
  1. लेखक ने योग को परमात्मा और आत्मा का मिलन लिखा है |
  • क्या व्यापक और व्याप्य होने से परमात्मा और आत्मा मिले हुए नहीं हैं ? दोनों की सत्ता अलग है पर सर्वव्यापक होने से परमात्मा आत्मा में भी है |
  1. लेखक ने योग साधना के मुख्य दो भेद बताएं हैं – राजयोग और हठयोग |
  • महर्षि दयानन्द ने हठयोग वर्जित किया है (देखिये सत्यार्थ प्रकाश तृतीय सम्मुल्लास)|
  1. लेखक ने हठयोग को राजयोग का पूरक लिखा है |
  • क्या महर्षि पातंजलि, व्यास और दयानन्द को योग दर्शन में अपूर्णता नहीं दिखी (जो की लेखक को दिख गयी) |
  1. योगानां राजा राजयोग: |
  • किस ऋषि ने लिखा है प्रमाण दीजिये |
  1. लेखक ने हठयोग के लिए लिखा है की यह राजयोग की पूरक पद्धति है | इसमें आसान, प्राणायाम और षट्कर्म को अधिक महत्व दिया गया है |
  • क्या राजयोग में प्राणायाम के बिना चित निरोध किया जा सकता है?
  1. लेखक ने हठयोग प्रदीपिका का उदहारण देते हुए हठयोग को राजयोग की सिद्धि की सीडी कहा है |
  • हठयोग प्रदीपिका निषिद्ध है (देखिये सत्यार्थ प्रकाश तृतीय सम्मुल्लास)|
  1. धारणा का सूत्र और अर्थ गलत दिया गया है |
  • विभुतिपाद का पहला सूत्र है “देशबन्धश्चित्तस्य धारणा” न की “देश्बन्धश्चित्त्स्याणाम्”| सहि अर्थ है – “देह को किसी अंगविशेष में बांध देना धारणा है” | लेखक के अनुसार किसी विशेष स्थान या बिन्दु पर केन्द्रित करना नहीं क्यों की इससे मूर्तिपूजा की पुष्टि हो सकती है |

इस सम्पूर्ण लेख में ऋषि विरोध मिलता है | आशा करता हूँ की आप मेरी शंकाओ का समाधान करेंगे अथवा अगले अंक में क्षमा याचना करते हुए यह लेख वापस ले लेंगे | मिथ्या ज्ञान से कभी मानवता की वृद्धि नहीं हो सकती किंतु केवल ह्रास ही हो सकता है |

 

ऋषि भक्त और आर्य समाज का सेवक,

प्रशांत शर्मा

क्या श्री राम दीवाली के दिन वनवास से अयोध्या लोटे थे ?

29 Oct

आज फिर कार्तिक अमावस्या आ गयी है | ३० अक्तूबर २०१६ ईस्वी या कार्तिक कृष्ण पक्ष १५ सन् २०७३ विक्रम संवत | आज विश्व भर में दीवाली पर्व की खुशियाँ मनाई जायेंगी; असंख्य दीपकों द्वारा अँधेरे पर उजाले की विजय घोषित की जाती है | आज ही के दिन १८८३ ईस्वी या १९४० विक्रम को, मंगलवार के दिन, सायंकाल के ६ बजे, भारत के राजस्थान प्रान्त के अजमेर जिले में  महान समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने नश्वर शरीर से महाप्रस्थान किया था | सत्य उजाले का प्रतीक है और असत्य अँधेरे का | मनुष्यों को उचित है कि वे सर्वदा सत्य का ग्रहण करें और असत्य का त्याग |

जब दीवाली की बात होती है तो श्री राम के वनवास से लौटने की बात भी होती है | आइये विचार करें कि यह कहाँ तक सत्य है |

यह तो पाठकों को विदित होगा कि श्री राम के राज्याभिषेक का अनुमोदन परिषद् ने चैत्र मास में किया था | वाल्मीकि रामयाण के अयोध्या काण्ड के तृतीयः सर्ग के चोथे श्लोक में महाराज दशरथ ने नगर और जनपद के प्रमुख लोगों के समक्ष वसिष्ठ और वामदेव आदि ब्राह्मणों से कहा “ यह चैत्र मास बड़ा सुन्दर और पवित्र है, इसमें सारे वन – उपवन खिल उठे हैं; अतः इस समय श्रीराम का युवराज पद पर अभिषेक करने के लिये आप लोग सब सामग्री एकत्र कराइये” |

पाठकों को यह भी विदित होगा की जिस दिन श्री राम का अभिषेक होना था उसके दूसरे ही दिन उन्हें वनवास जाना पड़ा | पाठकगण यह भी जान लें कि चैत्र मास मार्च और अप्रैल में होता है |

अयोध्याकाण्ड में ही महात्मा भरत श्री राम के वापस लोटने और राज्य करने के आदेश पर कहते हैं “रघुकुलशिरोमणे ! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर नूतन वर्ष के प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा” |

पाठकों को यह विदित होवे कि श्री राम और श्री भरत दोनों ही सत्यवादी थे और दो विरोधी बातें नहीं करते थे |

पाठकगण स्वयं ही निश्चय कर लें कि चैत्र के गए हुवे का वर्ष चैत्र में ही पूर्ण होगा न की कार्तिक को | अब अगर श्री राम का आगमन चैत्र के बजाये कार्तिक में होता है तो दो बातें हो सकती हैं:

  1. श्री राम चौदह वर्षों कि समाप्ति से पहले आ गए – चैत्र से ६ महीने पहले तेरहवें वर्ष के कार्तिक में या
  2. श्री राम चौदह वर्षों कि समाप्ति के ६ महीने बाद आये – चैत्र से ६ महीने बाद चौदहवें वर्ष में |

पहले दृष्टान्त में श्री राम झूठे हो जाते हैं क्योंकि वे चौदह वर्ष से पहले आ गये और दूसरे में श्री भरत क्योंकि उन्होंने अपने आप को अग्नि में भस्म नहीं किया | सत्य तो यह है की श्री राम का अयोध्या आगमन चैत्र मास में ही हुआ था |

युद्धकाण्ड में श्री राम की अयोध्या वापसी में महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उतरने के वृतांत में वाल्मीकि रामायण कहती है – “चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भरद्वाज आश्रम पहुंचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया “ |

यहां पर शंका होती है कि किस मास की पंचमी ? इसका समाधान यह है की मास बताये बिना तिथि बताई जाये तो प्रथम मास की जननी चाहिये – अर्थात् चैत्र की पंचमी |

ऊपर दिये हुए तर्क और प्रमाणों से सिद्ध होता है कि श्री राम का अयोध्या आगमन दीवाली के दिन नहीं हुआ था |

दीवाली पर लक्ष्मी पूजन की भी प्रथा है और कोई लोग नारायण और लक्ष्मी का अर्थ परमेश्वर और उसकी कृपा लेते हैं | आइये महर्षि दयानंद के सत्यार्थ प्रकाश द्वारा उनका अर्थ जाने |

महर्षि प्रथम समुल्लास में अर्थ देते हैं –

नारायण – जल और जीवों का नाम नारा है, वे अयन अर्थात् निवासस्थान हैं जिसका इसलिये सब जीवों में व्यापक परमात्मा का नाम नारायण है |

लक्ष्मी – जो सब चराचर जगत् को देखता, चिह्नित अर्थात् दृश्य बनाता, जैसे शरीर के नेत्र, नासिका और वृक्ष के पत्र, पुष्प, फल, मूल, पृथिवी, जल के कृष्ण, रक्त, श्वेत, मृत्तिका, पाषाण, चन्द्र, सूर्य्यादी चिह्न बनाता तथा सब को देखता, सब शोभाओं की शोभा और जो वेदादि शास्त्र वा धार्मिक विद्वान् योगियों का लक्ष्य अर्थात् देखने योग्य है इससे परमेश्वर का नाम लक्ष्मी है |

दीवाली की शुभ कामनाओं के साथ पाठकों से मेरा निवेदन है की जिस तरह आज उजाला अँधेरे पर हावी पड़ रहा उसी तरह आप भी सत्य को ग्रहण करके असत्य का त्याग करिये | महर्षि दयानन्द द्वारा हमें शिक्षा रुपी जो मणि मिले उससे हम अपने जीवन का उत्थान करें | ऋषि शिक्षा को अपने आचरण में लायें केवल बातों से जीवन नहीं सुधरता | जो निकले हुए सूर्य को देखते हुए भी नकारता है उसे विद्वान् नहीं कहा जाता है| आज आर्य समाज के कई आचार्य एवं शिक्षक स्वार्थ वश हठ योग आदि ऋषि विरुद्ध क्रियाओं का प्रचार कर रहें है | मेरी इन विद्वानों से प्रार्थना है की वे ऋषिओं की पद्धति को ही अपनायें एवं मानव मात्र को शिक्षित करें |

—– पंडित प्रशांत शर्मा

ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना

19 Oct

ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना

यह तीन शब्द, स्तुति, प्रार्थना और उपासना आप हर सत्संग में सुनते हैं | हर किसी के मन में यह प्रश्न उठता है कि यह होते क्या है? क्या यह तीनो एक ही हैं? और अगर एक हैं तो ईश्वरस्तुतिप्रार्थानोपासना हम क्यों बोलते हैं?

आइये सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास से इनकी परिभाषा देखते हैं|

स्तुति – जिससे ईश्वर में प्रीति, उसके गुण कर्म स्वभाव से अपने गुण कर्म स्वभाव का सुधारना होता है उसे स्तुति कहते हैं|

प्रार्थना – जिससे निरभिमानता, उत्साह और सहाय का मिलना होता है उसे प्रार्थना कहते हैं|

उपासना – जिससे परब्रह्म से मेल और उसका साक्षात्कार होता है उसे उपासना कहते हैं|

प्रश्न – स्तुति कितने प्रकार की होती है?

उत्तर – स्तुति दो प्रकार की होती है:

  • सगुण – वह परमात्मा सब मैं व्यापक, शीघ्रकारी और अनंत बलवान जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सबका अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा करता है| यह सगुण स्तुति कहलाती है अर्थात् जिस-जिस गुण से सहित परमेश्वर की स्तुति करना वह सगुण|
  • निर्गुण –(अकाय) अर्थात् वह कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिसमें छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिसमें क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग द्वेषादी गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है|

प्रश्न – सगुण माने साकार और निर्गुण माने निराकार, ऐसा हम सुनते और मानते आये हैं|

उत्तर – यह आपका सुनना और मानना गलत है क्यों कि ईश्वर सर्वदा स्वतंत्र है और कभी भी शरीर और नस-नाड़ी या जन्म–मरण के बन्धन में नहीं आता है; इन गुणों से रहित होने के कारण वह निर्गुण कहलाता है| उसी प्रकार सर्वज्ञ, न्यायकारी आदि गुणों से सहित होने के कारण वह सगुण कहलाता है|

प्रश्न – स्तुति का क्या फल होता है?

उत्तर– स्तुति से फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण कर्म स्वभाव अपने भी करना| जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवें| और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है|

प्रश्न – प्रार्थना का क्या फल होता है?

उत्तर – प्रार्थना में यह जानते हुए कि हम से भी कहीं बड़ी शक्ति है, हमारे अभिमान का नाश करती है| उसी प्रकार जब हमारा मन दुर्बलता से भर जाता है तो यही प्रार्थना हमारे अन्दर ईश्वर की सहायता से उत्साह और शक्ति का संचार करती है आदि| प्रार्थना द्वारा हम ईश्वर से मेधा नामक बुद्धि, तेज, धैर्य, पराक्रम, सामर्थ्य, बल आदि मांगते हुए अपने कर्तव्य पथ पर पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए चलते जायें|

प्रश्न – उपासना कैसे की जाती है?

उत्तर – उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है| साधारण शब्दों में कहें तो हमारा मन जो हमेशा इधर उधर भागता रहता है उसे विषयों से हटा कर अंदर की और लगा दें – जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने कवच के अंदर समेट लेता है उसी प्रकार मनुष्य अपने मन को अपनी अन्तरात्मा की और मोड़ दे |

प्रश्न – इसको सपष्ट करके समझाओ|

उत्तर – महर्षि पातंजलि अपने योग सूत्र में समझाते हैं – जो उपासना का आरंभ करना चाहै उसके लिये यही आरंभ है कि वह किसी से वैर न रक्खे, सर्वदा सब से प्रीति करे | सत्य बोले | मिथ्या कभी न बोले | चोरी न करे | सत्य व्यवहार करे | जितेन्द्रिय हो | लम्पट न हो और निरभिमानी हो | अभिमान कभी न करे | यह पांच प्रकार के यम मिल के उपासनायोग का प्रथम अंग है |

फिर महर्षि आगे कहते हैं कि राग द्वेष छोड़ भीतर और जलादि से बाहर पवित्र रहे | धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे | प्रसन्न होकर आलस्य छोड़ सदा पुरुषार्थ किया करे | सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे, अधर्म का नहीं | सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढ़े पढ़ावे | सत्पुरुषों का संग करे और ‘ओ‌३म्’ इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार करे नित्यप्रति जप किया करे | अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे | इन पांच प्रकार के नियमों को मिला के उपासनायोग का दूसरा अंग कहता है |

प्रश्न – क्या ऊपर दिए दो अंगों का ही योग सूत्र में वर्णन है?

उत्तर – महर्षि पातंजलि ने योग सूत्र में योग के आठ अंग बतायें हैं; जिनका वर्णन हम आने वाले अंको में प्रकाशित करने का प्रयत्न करेंगे |

प्रश्न – क्या यह जो योगा की कक्षायें चलतीं है वह यह योग सिखाती हैं?

उत्तर – जी नहीं, अधिकांश कक्षायें हठ योग सिखातीं हैं | हठ योगा किसी भी ऋषि द्वारा प्रतिपादित नहीं है | महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय सम्मुल्लास में हठ योग वर्जित किया है |

प्रश्न – प्राणायाम का प्रमाण क्या है ?

उत्तर – योगदर्शन का सूत्र (२/२८) कहता है कि जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है | जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है |

मनुस्मृति का श्लोक (६/७१) कहता है – जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर शुद्ध होते हैं वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं |

प्रशन – प्राणायाम की विधि क्या है?

उत्तर – महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय सम्मुल्लास में योगदर्शन के समाधिपाद के चौतींसवे (३४) सूत्र कि व्याख्या करते हुए समझाया हे – जैसे अत्यंत वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे | जब बाहर निकालना चाहे तब मुलेंद्रिय को ऊपर खींच रखे तब तक प्राण बाहर रहता है | इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है | जब गभराहट हो तब धीरे – धीरे भीतर वायु को ले के फिर भी वैसे ही करता जाय जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (ओ३म्) इसका जप करता जाय इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है |

प्रश्न – प्राणायाम कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर – प्राणायाम के प्रकार – एक ‘बाह्यविषय’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना | दूसरा ‘आभ्यंतर’ अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाय उतना रोक के | तीसरा ‘स्तम्भवृत्ति’ अर्थात् एक ही बार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना | चौथा ‘बाह्याभ्यंतराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिये बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की और प्राण को धक्का देकर रोकता जाय | ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं | बल पुरुषार्थ बढ़ कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है | इससे मनुष्य शरीर में वीयर्य् वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर, बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा |

*** विस्तृत जानकारी के लिये महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश का तृतीय और सप्तम समुल्लास पढ़िये |

लेखक: श्री पंडित प्रशान्त कुमार शर्मा जी

Ishwar Stuti Prarthana aur Upasana

19 Oct

Ishwar Stuti Prarthana aur Upasana

We hear these three words Stuti, Prarthana and Upasana in every satsang. A question arises in everyone’s mind that what are these? Do they represent the same meaning? If yes, then why do we say the three words?

Let’s ponder on the definition of these from the seventh chapter of “The Light of Truth”.

Stuti – or appreciation creates love for God and helps a man to reform his character by contemplating the character of God.

Prarthana – or prayer creates humility, hopefulness and confidence.

Upasana – conduces to communion with God and his realization.

Question – How many kinds of Stuti is there?

Answer – Stuti or appreciation is of two kinds:

  • Sagun Stuti – or Positive appreciation consists of the contemplation of those attributes which God has, e.g. He is all-pervading, soon-acting, infinite, strong, pure, all-knowing, existing within all, transdental, ever-living, and self-proven, and that He makes known to His ever-living subjects, i.e. souls, through His ever-living knowledge the correct meanings of things in the form of the Vedas. Here we think of those qualities which exist in God.
  • Nirgun Stuti – or Negative appreciation is the contemplation of the nonexistence of certain qualities which do not belong to God but belong to other things e.g. He does not come into a body. He does not take a physical birth; He has no defects in Him. He does not submit Himself to the limitations of nerves etc. He never does any sinful thing, at no time has He trouble, pain and ignorance. Here, we think of God as being free from foolery, aversion etc.

Question – Sagun means consisting of form and Nirgun means without form, this is what we have heard and is our belief too.

Answer – What you have heard and your belief is wrong because God is always free and is never bounded with the limitations of nerves and cycle of birth and death; devoid of these qualities He is called Nirgun. Similarly, Consisting of All-knowing, Just etc. qualities/capabilities, He is termed as Sagun.

Question – What are the fruits/purpose of Stuti?

Answer – The purpose of Stuti or appreciation is to imbibe those qualities, actions and characteristics which God has e.g. He is just, therefore we too should be just. If a man sings laudations to God very loudly like a court-fool and does not reform his conduct, his Stuti or prayer is meaningless.

Question – What are the fruits/purpose of Prarthana?

Answer – In prayer we know that there is a power much greater than us, thus destroys our arrogance. Similarly, when our mind is engulfed in weakness, this prayer generates internal hopefulness, confidence etc. in us by the grace of God. Through prayer we should ask for Medha intellect, enlightenment, patience, bravery, capabilities, strength etc. and should walk on our path of duty by doing human efforts.

Question – How do we do Upasana?

Answer – The word Upasana or communion means to sit close (union of two). In simple words, our mind which is always running around after material aspects should be turned inwards away from material subject/s – like a tortoise/turtle withdraws its limbs in his shell, so should the humans turn their minds inwards towards the soul.

Question – Please elaborate this.

Answer – Maharishi Patanjali in his Yog Sutras explain that – for a person intending to start Upasana should begin by bearing no ill-will towards anybody, love all persons at all times. Always speak the truth (Satya); never speak the untruth (Asatya). Shun thievery; have fair dealings. Govern his senses; never be sensual. Be humble; never be arrogant. These five Yamas form the first step of Upasana Yog.

Maharishi further teaches that clean your inside by shunning infatuation and aversion; clear your outside body with water. Work righteously, neither be overjoyed at profit, nor over pained at loss; be not idle, work assiduously with a cheerful heart. Control your joys and sorrows, practise virtue and shun vice. Study true (Satya) books and associate with truthful men. Recite God’s name “AUM” or “OM” and concentrate your thought on its meanings, surrender yourself to the will of the Supreme Being. These five Niyamas constitute the second step of Upasana yog.

Question – Are the above two steps only described in Yog Sutras?

Answer – Maharishi Patanjali has described eight steps required to be in communion with God and realize his existence as an omnipresent and omniscient being. I will attempt to describe these steps in the upcoming blogs.

Questions – Does the prevalent Yoga classes teach this Yog?

Answer – No, most of these classes teach Hatha Yoga. Hatha Yoga is not preached by any Rishi. Maharishi Dayanand has advised to shun Hatha Yoga in the third chapter of “The light of Truth”.

Question – What is the proof of Pranayaam?

Answer- The sutra (2/28) of Yog Darshan says that when a man does breathing exercises, every impurity is removed in quick succession and the light of knowledge dawns upon him. The inner light goes on increasing until the salvation (Moksha) is attained.

Manu Smriti (6/71) says that just as the impurities of the metals, e.g., gold etc., are destroyed by heating them in fire, similarly the defects of the mind and other senses are removed and their purity is achieved by the performance of the breathing exercise.

Question – What is the method of Pranayaam?

Answer – In the third chapter of “The Light of Truth”, Maharishi Swami Dayanand Saraswati explains the 34th Sutra of Yog Darshan’ s Samadhipaad  – Just as strong vomiting throws out food and water, similarly the breath should be forcibly thrown out and checked there as long as possible. When it is intended to throw out the breath, the pelvis should be kept pulled upward. So long will the breath remain out. This is the way how to keep the breath out long. When there is a feeling of uneasiness, then the breath should be slowly drawn in. The above process should be repeated according to the capacity and desire. This should be accompanied by the recitation of the sacred syllable ‘OM’ or ‘AUM’ in the mind. This conduces to the purification and firmness of the Soul and the mind.

Question – How many types of Pranayaam are there?

Answer – Types of Pranayaam or breathing exercises – breathing exercise number one is ‘External’ i.e. to check the breath outside. Number two is stopping the breath inside as long as possible. Number three is immediate checking, i.e. stopping the breath all at once at whatever place one desires. Number four is ‘Out-in-throwing’ or drawing the breath forcibly inside when it has the tendency to go in. By thus counteracting the inspiration and expiration both, the movements are kept in check and control of breath leads to the subjugation of the mind and the senses. This process increases the strength and energy and so sharpens the intellect that it can easily apprehend the most obtuse and subtle problems. This helps the development of the vital fluid (semen) in the man’s body, which in turn is productive of firm strength, courage, control of senses, and acquisition of the knowledge of all sciences in no time.

*** For further elaboration and understanding, please read the third and seventh chapters of “The Light of Truth” written Maharishi Swami Dayanand Saraswati.

Author:  Pt. Prashant Kumar Sharma

क्या ऋषियों में विरोध होता है?

7 Aug

कई लोगों का मंतव्य है कि ऋषियों के अपने मत होते हैं और कहीं कहीं उनमें आपस में भेद होता है| आइये पहले हम “ऋषि किसको कहते हैं” यह समझ ले| निरुक्त भाष्य (२/३/११) बताता है कि जो सूक्ष्मदर्शी अथवा तत्वदर्शी है उसे ऋषि कहते हैं| ऋग्वेद (१/१/२) कहता है कि “जिसने मन्त्रों के अर्थों को देखा है अर्थात जिसने वेद-मन्त्रों का दर्शन किया है, वह मंत्र-दृष्टा ही ऋषि है”| ऋषि को आप्त भी कहते हैं क्योंकि वह आप्ति प्राप्त कर चुका होता है| योगिराज वात्स्यायन ने महर्षि गौतम के न्याय दर्शन का भाष्य करते हुए आप्त की पूर्ण परिभाषा दी है – “जो साक्षात् सब पदार्थविध्याओं का जानने वाला, कपट आदि दोषों से रहित धर्मात्मा है, कि जो सदा सत्यवादी, सत्यमानी और सत्यकारी है, जिसको पूर्ण विध्या से आत्मा में जिस प्रकार का ज्ञान है उसके कहने की इच्छा की प्रेरणा से सब मनुष्यों पर कृपाद्रष्टि सब सुख होने के लिए सत्य का उपदेश का करनेवाला है और जो पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त सब पदार्थों को यथावत् साक्षात् करना और उसी के अनुसार वर्त्तना है इसी का नाम आप्ति है|” ऋषि असम्प्रज्ञात (निर्बीज) समाधी (ईश्वर का साक्षात्कार और मन की निरुद्ध अवस्था – मन/चित की संपूर्ण वृत्तिओं का निरोध) प्राप्त कर चुका होता है|

जैसा कि निरुक्त भाष्य का कहना है जो सूक्ष्म तत्वों का साक्षात्कार कर लेते हैं| उदाहराण के लिए लीजिये दो व्यक्तियों का एक लकड़ी की कुर्सी को देखना| उन दोनों व्यक्तियों से अगर पुछा जाय तो दोनों कहेंगे कि वह कुर्सी है और लकड़ियों से बनाई गयी है| यह तो आम मनुष्य का देखना है; ऋषियों का साक्षात्कार निरभ्रम और सूक्ष्मता के स्तर पर होता है – अर्थात कितने परमाणुओं का मेल है, किस तत्व की कितनी मात्रा है और किस महाभूत की प्राथमिकता है आदि| अब पाठकगण स्वयं विचार करें कि जब ऋषियों का साक्षात्कार एक सा है तो उनके अलग अलग मत कैसे होंगे? हां यह बात और है कि सब ऋषियों का ज्ञान एक बराबर नहीं होता है| उदाहरणार्थ एक ऋषि ने कुर्सी को देखा और दुसरे ने नहीं देखा या उसकी आवश्यकता नहीं हुई तो दुसरे को उसका ज्ञान नहीं होगा| पर जिन जिन वस्तुओं का ज्ञान दोनों ऋषियों में है वह एक सा होगा| अब अगर हम कहें कि स्वार्थवश ऋषिओं ने अलग अलग मत दे दिए तो यह हमारी भूल होगी क्योंकि जैसा ऊपर आप्त की परिभाषा में समझाया गया है ऋषि कपट आदि दोषों से रहित होता है और सत्यवादी, सत्यमानी और सत्याकारी होता है, इसीलिये उसमे पक्षपात और निजी स्वार्थ नहीं होता और वह संपूर्ण मानवता के सुख के लिए सत्य का उपदेश करता है|

यह भ्रान्ति भी लोगों में पाई जाती है कि ऋषि अपना शरीर छोड़ कर दुसरे शरीरों में भोग करने के लिए जाते थे और भोगने के बाद वापस अपने शरीर में आ जाते थे| पाठकगण विचार करें कि जिसने असम्प्रज्ञात समाधी प्राप्त करली हो और जो मोक्ष रूपी आनंद का भागी हो गया हो वह संसार के तुच्छ भोग में क्यों फंसेगा? जिस तरह से आम मनुष्य के सामने अगर स्वच्छ जल और गटर का दूषित जल रख दें तो वह गटर के दूषित जल को ठुकरा कर स्वच्छ जल ही पियेगा| दूसरी बात यह है कि शरीर में आवागमन ईश्वर की व्यवस्था से होता है – न्यायपूर्वक कर्मफल के अनुसार होता है|

ऊपर के अनुच्छेदों से यह हमने देख लिया कि ऋषिओं में विरोध नहीं होता था क्योंकि दो विरोधी वाक्यों में एक ही सत्य हो सकता है| आइये अब देखतें हैं कि क्या आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ऋषि थे? पाठकगण स्वयं ही निश्चय कर लें कि सन १८७५ इसवी (१९३२ वि.) से जितने भी महर्षि दयानन्द रचित ग्रन्थ हैं उनमें कहीं भी आर्ष ग्रंथों से विरोध नहीं है| भेद केवल पक्षपाती/स्वार्थी मनुष्यों द्वारा आर्ष ग्रंथो का भाष्य करने में मिलता है| महर्षि दयानन्द के आचारण में कहीं भी असत्य, पक्षपात, स्वार्थ, द्वेष, अहंकार, आदि नहीं दिखते हैं; बल्कि सत्यभाषण, सत्यव्यवहार, सत्य पालने में निर्भीकता, असत्य का विरोध, समस्त मानवों के उत्कर्ष की भावना/कार्य, अक्रोध आदि का प्रमाण मिलता है|

अगर पाठकगण किसी भी ऋषि प्रणीत ग्रंथों में विरोध देखतें हैं तो कृपया मुझे अवगत करायें| पणबंध (शर्त) केवल इतनी है कि ऋषियों के ग्रन्थ देखें जाएं न कि किसी दूसरे विद्वान का भाष्य| क्योंकि अगर कोई अपनी ऑंखें बंद करके उसके ऊपर काली पट्टी बांध ले और कहे कि सूर्य प्रकाश नहीं देता तो समझदार मनुष्यों को उसका विशवास नहीं करना चाहिये|

मनुष्यों के लिए यह अनिवार्य है कि अगर वे स्वयं का और मानवता का भला चाहते है तो ऋषिओं के बताये मार्ग पर चले, ऋषिओं से विरोध करके नहीं| न्याय और योग दर्शनों ने ऋषिओं की शिक्षा को शब्द प्रमाण के अंतर्गत माना है|

महर्षि दयानन्द कृत व्यवहारभानु: की एक झांकि

22 Jul

विध्या-प्राप्ति के उपाय

प्र – विध्या किस-किस प्रकार और किन कर्मों से प्राप्त होती है?

उ – विध्या चार प्रकार से आती है:

  1. आगमकाल – आगमकाल उसको कहते हैं कि जिससे मनुष्य पढ़ाने वाले से सावधान होकर ध्यान दे के विध्यादि पदार्थ ग्रहण कर सके|
  2. स्वाध्यायकाल – स्वाध्यायकाल उसको कहते हैं कि जो पठन-समय में आचार्य के मुख से शब्द, अर्थ और सम्बन्धों की बातें प्रकाशित हों उनको एकान्त में स्वस्थचित होकर पूर्वापर विचार के ठीक-ठीक ह्रदय में दृढ़ कर सकें|
  3. प्रवचनकाल – प्रवचनकाल उसको कहते हैं कि जिससे दूसरे को प्रीति से विद्याओं को पढ़ा सकना|
  4. व्यवहारकाल – व्यवहारकाल उसको कहते हैं कि जब अपने आत्मा में सत्यविद्या होती है तब यह करना यह न करना, वही ठीक-ठीक सिद्ध होके वैसा ही आचरण करना हो सके|

यह चार प्रयोजन हैं तथा अन्य भी चार कर्म विध्या प्राप्ति के लिए हैं|

  1. श्रवण – श्रवण उसको कहते हैं कि आत्मा मन के और मन श्रोत्र-इन्द्रियों के साथ यथावत् युक्त करके अध्यापक के मुख से जो-जो अर्थ और सम्बन्ध के प्रकाश करनेहारे शब्द निकालें उनको श्रोत्र से मन और मन से आत्मा में एकत्र करते जाना|
  2. मनन – मनन उसको कहते हैं कि जो-जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध आत्मा में एकत्र हुए हैं उनका एकान्त में स्वस्थचित होकर विचार करना कि कौन शब्द किस अर्थ के और कौन अर्थ किस शब्द के साथ सम्बन्ध अर्थात् मेल रखता और इनके मेल में किस प्रयोजन की सिद्धि और उलटे होने में क्या-क्या हानि होती है? इत्यादि|
  3. निदिध्यासन – निदिध्यासन उसको कहते हैं कि जो-जो अर्थ और सम्बन्ध सुने-विचारे हैं वे ठीक-ठीक हैं व नहीं? इस बात की विशेष परीक्षा करके दृढ़ निश्चय करना|
  4. साक्षात्कार – साक्षात्कार उसको कहते हैं कि जिन अर्थों के शब्द और सम्बन्ध सुने, विचारे और निश्चय किए हैं उनको यथावत् ज्ञान और क्रिया से प्रत्यक्ष करके व्यवहारों की सिद्धि से अपना और पराया उपकार करना आदि विध्या की प्राप्ति के साधन हैं|

आइये अब हम इसको साधारणतया आज के वातावरण में देखें| एक मोटा सा दृष्टांत सेकेंडरी स्कूल के विद्यार्थी का ले लीजिये| वह विद्यार्थी जब कक्षा में पड़ता है तो उसका कर्तव्य होता है कि वह बड़े ध्यान से अपने अध्यापक की बात सुने और ग्रहण करे| यह आगमकाल कहलाता है| श्रवण कर्म इसी के अंतर्गत आता है – विद्यार्थी जो भी अध्यापक के मुख से अपने श्रोतों द्वारा सुनता है वह मन से अपने आत्मा में एकत्र करता हे अर्थात sub-conscious में याद कर लेता है| स्कूल में जो सिखा है उसको विद्यार्थी घर आ कर अपने स्टडी रूम में जा कर आलस्य आदि दूर कर के अपनी टेक्स्ट बुक खोल के जो कक्षा में सीखा है उसे अपनी टेक्स्ट बुक से मिला कर और विचार कर के परिपक्व कर ले ताकि वह पूरी तरह से मन में बैठ जाए| इसे स्वाध्यायकाल कहते हैं| कर्म रूप में इसे मनन करना कहते हैं| इसके बाद वही विद्यार्थी का कर्तव्य होता है कि वह दुसरे विद्यार्थियों से मंत्रणा या प्रैक्टिकल करके, तर्क – वितर्क करके जो समझा है उनको सिखाये और स्वयं सीखे| इसे प्रवचनकाल कहते हैं| कर्म रूप में यह निदिध्यासन कहलाता है अर्थात तर्क-वितर्क, टेक्स्ट बुक्स आदि द्वारा निश्चय पर आना| इसके बाद अब जो समझा है उसे प्रैक्टिकल में लाना – उदाहरणत दो द्रव्यों के मिलाने से कौन सा द्रव्य बनता है उसे प्रैक्टिकल Titration के द्वारा जानना|इसे व्यवहारकाल कहते हैं| कर्म रूप में यह साक्षात्कार कहलाता है – जो कक्षा में सिखा था उसको विचार करके, निश्चय करके, यथावत प्रयोग में लाना||

 

यह तो एक मोटा सा उदहारण था; इसी को सूक्ष्मता से अपनाते हुए ऋषिओं की शिक्षा द्वारा अपने जीवन के व्यवहारों में मानवता के उत्कर्ष के लिए लगा दीजिये| यह धर्म का रास्ता हो जायगा और वास्ताव में आप विध्या ग्रहण करना शुरू कर देंगे|

—– पंडित प्रशांत शर्मा

धर्म

15 Jun

–पंडित प्रशांत कुमार शर्मा जी के ब्लॉग ‘धर्म’ का हिंदी अनुवाद

–अनुवादिका: श्रीमती शान्ता देवी सिंह जी

 

आरम्भ करने से पहले, मैं सभी धर्म प्रेमियों से आग्रह करता हूँ कि आप मेरा मंतव्य मेरी वेबसाइट “Melbourne Arya” के “Statement of my beliefs” सेक्शन में देख लीजिये| मेरा उद्देश किसी का अपमान करना या नीचा दिखाना नहीं है, किंतु मैंने इस लेख के द्वारा धर्म के विषय को समझाने का प्रयास किया है| यदि इस लेख से किसी को दुःख पहुँचता है तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ|

प्रशन – धर्म क्या है?

उत्तर – मेरा यह मानना है कि धर्म जीने का वह रास्ता है जिससे सबकी भलाई, बुद्धि, सत्य (अति सत्य) ज्ञान, सम भाव, सदाचार और सभी परोपकारी गुणों द्वारा मानवता का उत्कर्ष करना और नाशकारी एवं बुरे गुणों का विरोध करना है|

 

अब महर्षि दयानन्द के शब्दों में धर्म की व्याख्या करते हैं:

o   “जो पक्षपातरहित, न्यायाचरण सत्यभाषण आदि युक्त ईश्वर आज्ञा, वेदों से अविरुद्ध है उस को ‘धर्म’ और जो पक्षपातसहित अन्यायाचरण, मिथ्याभाषण आदि ईश्वर आज्ञा भंग, वेद विरुद्ध है उस को अधर्म मानता हूँ|” — स्वमंतव्यामंतव्यप्रकाश:

o   “जिसका स्वरुप ईश्वर की आज्ञा का यथावत् पालन और पक्षपातरहित न्याय सर्वहित करना है, जो कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सुपरीक्षित और वेदोक्त होने से सब मनुष्यों के लिये यही एक मानना योग्य है उसको धर्म कहते हैं|” — अर्योद्देश्यरत्नमाला

o   “हे मनुष्य लोगों! जो पक्षपातरहित, न्याय, सत्याचरण से युक्त धर्म है, तुम लोग उसी को ग्रहण करो, उसके विपरीत कभी मत चलो, किंतु उसी की प्राप्ति के लिये विरोध को छोड़ के परस्पर सम्मति में रहो, जिससे तुम्हारा उत्तम सुख सब दिन बढता जाय और किसी प्रकार के दुःख न हो| तुम लोग विरुद्ध वाद छोड़ के परस्पर अर्थात् आपस में प्रीति के साथ पढना पढाना, प्रश्न उत्तर सहित संवाद करो, जिससे तुम्हारी सत्यविद्या नित्य बढती रहे|…….”  — ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदोक्तधर्मविषय: – ऋग्वेद (मंडल १०, सूक्त १९१, मंत्र २)

महर्षि कणाद वैशेषिक दर्शन (१:२) में कहते हैं “जिससे अभ्युदय (लौकिक कल्याण) और निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती, वह धर्म है|

महर्षि जैमिनि, मीमांसा दर्शन (१/१/२) में धर्म की परिभाषा देते हैं “प्रेरणा जिसका लक्षण – साधन एवं चिन्ह है, ऐसा बोधित विषय धर्म है|

 

आगे बढने से पहले चलिए हम उस प्रशन का उत्तर देने का प्रयास करें जो कई लोगों के मस्तिष्क में उभर रहा होगा.

प्रशन – मैं किस रिलिजन (मत) की ओर संकेत कर रहा हूँ?

उत्तर – मेरा संकेत ‘धर्म’ की ओर है न की किसी ‘मत’ (रिलिजन) की ओर| हम ऊपर धर्म की परिभाषा देख चुके हैं, आइये अब रिलिजन की परिभाषा देखें.

ऑक्सफ़ोर्ड (Oxford) शब्दकोष के अनुसार रिलिजन का अर्थ है:

मनुष्यों का किसी अलौकिक नियंत्रण शक्ति और व्यक्तिगत ईश्वर या ईश्वरों का आज्ञापालन और पूजा का अधिकारी होना, ऐसी पहचान का आचार और मानसिकता पर प्रभाव होना; किसी विशवास और पूजा प्रणाली.”

तुलना करने पर धर्म और मत की परिभाषा में बहुत समानता है, परन्तु दोनों पूर्णयता एक जैसे नहीं हैं| साधारणतया लोग धर्म शब्द से ही मत (रिलिजन) का ग्रहण करते हैं| लेकिन रिलिजन शब्द से धर्म की परिभाषा नहीं की जा सकती, क्योंकि धर्म तो पक्षपात रहित शिक्षा / कार्य है जिससे मानवता की वृद्धि होती है और वह किसी स्थान, जाती, मत, रंग, पंथ आदि से नहीं बंधा होता है| सच में तो धर्म पूरी मानवता के लिए है| धर्म वह है जो ऋषिओं (कृपया मेरी वेबसाइट के “Statement of my beliefs” सेक्शन में पॉइंट ४ देखिये) द्वारा प्रचार/प्रसार किया गया है; महर्षि ब्रम्हा से लेकर महर्षि दयानन्द पर्यन्त|ऋषिओं के प्रचार में कहीं भी विरोध नहीं है, जब तक की हम आचार्य सायण, महीधर, प्रोफेसर मैक्स मुलर, राल्फ टी. एच. ग्रिफित और इनके जैसे सामान्य मन वाले विद्वानों के गलत अनुवाद को नहीं पढते हैं| महर्षि दयानन्द का कहना था:

“जो कुछ भी अज्ञान से ओत-प्रोत मनुष्यों या वो जो की मत अनुयायियों द्वारा पथ भ्रष्ट किए जा चुके हैं का मानना/विश्वास है, वह सब बुद्धिमानोके मानने योग्य नहीं है| वह आस्था ही सत्य और अपनाने योग्य है जिसका अनुकरण अप्तो द्वारा किया गया है| आप्त यानि कि वो मनुष्य जो कि सत्य बोलते, करते और सोचते हैं, हमेशा मानवता के भले का प्रचार करते हैं, निष्पक्ष और विद्वान हैं; परन्तु जो भी अप्तों द्वारा त्याज्य है वह मानने योग्य नहीं है और असत्य है|”

 

अब एक बहुत बड़ा प्रश्न उठताहै:

प्रश्न – हमें क्यों धर्म का पालन करना चाहिए?

उत्तर – इस का उत्तर बहुत सरल है| धर्म हमें उन्नति, पूर्ण – सुख, समानता और मानवता की ओर प्रोत्साहित करता है| धर्म से हमारे मन, दिमाग, इन्द्रियों को पाप करने से मुक्ति मिलती है| धर्म से हमारी सात्विकता, बुद्धि, मानवता और अच्छाई की उन्नति होती है|

 

कुछ लोगों के मन में धर्म के विषय में कुछ प्रश्न उठते होंगे| मैं उनको समझाने का प्रयत्न करता हूँ:

प्रश्न – हम छल के बिना कैसे उन्नति कर सकते हैं; संभवतः हम उतना धन न कमा सकें जिससे हम ठाठदार और आरामदायक जीवन व्यतीत कर सकें?

उत्तर – इस प्रश्न का उत्तर देने से पहेले मैं आप से पूछता हूँ कि ठाठदार और आरामदायक जीवन का अर्थ क्या है? यदि हम कहें कि हम सुख और शांति चाहते हैं, तो हमे अपने आप से पूछना चाहिए कि यह सुख और शांतिमय जीवन थोड़े समय का है या सदा के किए है?निश्चय ही सदा के लिये नहीं है; क्योंकि स्वभाव से मनुष्य प्रतिस्पर्धात्मक (competitive) है और ये जलन, इर्षा आदि नाकारात्मक भावनाओं को जन्म देता है जो कि दबाव और दुःख का कारण है; जबकि धर्म का अनुकरण करने से सकारात्मक भावनाओं का उदय होता है, चाहे हमारे पास धन की कमी ही क्यों न हो| उदहारण के लिये देखा जाये तो दान करने और दीन दुखियों की सहायता करने के बाद मनुष्य की अंतर – भावना में सन्तोष की प्राप्ति होती है| कृपया मुझे गलत मत समझियेगा क्योंकि मैं किसी को धन कमाने या एकत्रित करने से नहीं रोक रहा हूँ| मैं तो केवल निवेदन कर रहा हूँ कि आप धन कमाईये परन्तु बिना लालच के और  दूसरों को बिना हानि पहुचाये| मेरा तात्पर्य यह है कि गलत रास्ते से धन अर्जित करना अनुचित है|

 

प्रशन – यह देखा गया है कि जो धर्म के पथ पर चलता है उसे बहुत कष्ट उठाना पड़ता है|

उत्तर –महर्षि दयानंद गीता (१८:३७) का वचन सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में देते हुए बताते हैं कि “जो – जो विध्या और धर्म प्राप्ति के कर्म हैं वे प्रथम करने मैं विष के तुल्य और पश्चात् अमृत के सदृश होते हैं|” इसका उल्टा अधर्म के लिए सत्य है – आरंभ में अधर्म गुलाब की पंखुड़ियों जैसा लगता है, पर कांटों से हे अंत होता है| इसका अच्छा उदहारण है मानवता की हत्या करने वालों का जीवन| थोड़े समय तक उनके हाथ में शक्ति और शासन रहता है परन्तु उनका अंत दुःख, कलंक और अपमान ही रहता है| प्रत्येक इंसान को धर्म का पालन करना चाहिये; चाहे कितनी ही कठनाइयों का सामना करना पड़े| यह तप कहलाता है|

प्रशन – तप क्या है?

उत्तर – नीचे दी परिभाषा से हम समझने का प्रयास करेंगें:

“जल से शरीर के बाहर के अवयव, सत्याचरण से मन, विध्या और तप अर्थात् सब प्रकार के कष्ट भी सह के धर्म ही के अनुष्ठान करने से जीवात्मा, ज्ञान अर्थात् पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों के विवेक से बुद्धि दृढ़ निश्चय पवित्र होता है|….” सत्यार्थ प्रकाश तृतीयसमुल्लास: – मनुस्मृति (५/१०९)

“तप – शीत, उष्ण, सुख-दुःख आदि दव्न्दों का सहना ……….” –योग दर्शन (२:१)

प्रश्न – हो सकता है कि धर्म का पथ परिवार और मित्रगणों का हमसे  द्वेष करा दे| क्या यह सही होगा कि धर्म अपनाने के लिए हमे परिवार और मित्रगण का त्याग करना पड़े?

उत्तर – हर एक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने परिवार और मित्रों को सलाह दे कि धर्म का ही मार्ग सच्ची उन्नति और प्रसन्नता का मार्ग है| संभवतः आपकी ऐसी सलाह को वे गलत समझे और आपकी बातों पर ध्यान दिए बिना आप से द्वेष भाव रखें; तब आपके पास केवल यह रास्ता रह जाता है कि आप उनके लिए बुरी भावना नहीं रखते हुए उपेक्षा का भव अपनाये|

प्रश्न – धर्म के लक्षण क्या हैं?

उत्तर – महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने नीचे लिखे लक्षणों को बताया है (मनु स्मृति ने दस बताये हैं)

१.      अहिंसा – पूर्णयता वैर त्याग| अर्थात विचारों में भी वैर का त्याग|

२.      धृति – सदा धैर्य रखना|

३.      क्षमा – जो की निंदा, स्तुति, मानापमान, हानिलाभ आदि दुखों में भी सहनशील रहना|

४.      दम – मन को सदा धर्म में प्रवृत्त कर अधर्म से रोक देना अर्थात अधर्म करने की इच्छा भी न उठे|

५.      अस्तेय – चोरी त्याग अर्थात बिना आज्ञा व छल कपट विश्वासघात वा किसी व्यवहार तथा वेदविरुद्ध उपदेश से परपदार्थ का ग्रहण करना चोरी और उसको छोड़ देना साहुकारी कहाती है|

६.      शौच – राग द्वेष पक्षपात छोड़ के भीतर और जल मृत्तिका मार्जन आदि से बाहर की पवित्रता रखनी|

७.      इन्द्रिय-निग्रह – अधर्म आचरणों से रोक के इन्द्रियों को धर्म ही में सदा चलाना|

८.      धी: – मादकद्रव्य बुद्धिनाशक अन्य पदार्थ दुष्टों का संग, आलस्य प्रमाद आदि को छोड़ के श्रेष्ट पदार्थों का सेवन, सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास, धर्माचरण, ब्रह्मचर्य आदि शुभ कर्मों से बुद्धि बढाना|

९.      विद्या – पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त यथार्थज्ञान और उनसे यथायोग्य उपकार लेना, सत्य जैसा आत्मा में वैसा मन में, जैसा मन में वैसा वाणी में, जैसा वाणी में वैसा कर्म में वर्त्तना; इसके विपरीत अविद्या है|

१०.  सत्य – जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना, वैसा ही बोलना और वैसा ही करना भी|

११.  अक्रोध – क्रोधादि दोषों को छोड़के शान्त्यादि गुणों का ग्रहण करना|

ऊपर दिए गए लक्षणों को अलग शीर्षक में समझाने का प्रयत्न करेंगे|

तो ये निश्चय हुआ कि धर्म के बिना मानवता में कोई सुधार नहीं होता इसलिये हर्ष नहीं प्राप्त होता| यही कारण है की हमे कठनाइयों से डरे बिना धर्म का पालन करना चाहिये| हर मनुष्य का उद्देश्य मानवता को बढाना होना चाहिये| महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने नीचे लिखा बहुत ही अच्छा सुझाव दिया है:

“यदपि आज काल बहुत से विद्वान प्रत्येक मतों में हैं| वे पक्षपात छोड़ सर्वतंत्र सिद्धान्त अर्थात् जो – जो बातें सब के अनुकुल सब में सत्य हैं उनका ग्रहण और जो एक दुसरे से विरुद्ध बातें हैं, उनका त्याग कर परस्पर प्रीति से वर्तें वर्तावें तो जगत का पूर्ण हित होवे| क्योंकि विद्वानों के विरोध से अविद्वानो में विरोध बढ़ कर अनेकविध दुःख की वृद्धि और सुख की हानि होती है| इस हानि ने जो कि स्वार्थी मनुष्यों को प्रिय है, सब मनुष्यों को दुखसागर में डुबा दिया है| इनमें से जो कोई सार्वजनिक हित लक्ष में धर प्रवृत होता है उससे स्वार्थी लोग विरोध करने में तत्पर होकर अनेक प्रकार विघ्न करते हैं परन्तु ‘सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:’ अर्थात् सर्वदा सत्य का विजय और असत्य का पराजय और सत्य ही से विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता है| इस दृढ़ निश्चय के आलम्बन से आप्त लोग परोपकार करने से उदासीन हो कर कभी सत्यार्थप्रकाश करने से नहीं हटते|” – सत्यार्थ प्रकाश भूमिका

 

प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अधर्म छोड़ कर मानवता को बढाये| हर मनुष्य को तर्क बुद्धि का प्रयोग करके मानवता को बढाना चाहिये और स्वार्थी मनुष्यों की शिक्षा पर विश्वास नहीं करना चाहिये| एक शिक्षक या प्रचारक जो अपने स्वार्थ के लिए सत्य शिक्षा को बदलता है वह भ्रष्ट मनुष्य है और समाज और मानवता के लिए दीमक के समान है.

 

साधारण शब्दों में, हर एक को ऐसा व्यवहार करना चाहिये जैसा की वह अपने लिये चाहता/चाहती है – उदहारण के लिये, हमे किसी को धोका नहीं देना चाहिये क्योंकि हम धोका खाना नहीं चाहेंगे|

Dharm

3 Mar

Before we start our journey in understanding and establishing Dharm in us, I humbly request all readers to read the Statement of my beliefs and disclaimer on my website Melbourne Arya. There is not a slightest intention to dishonour or discredit anyone with the below article. The article is an attempt by me to promote a general understanding of Dharm. Any offence caused by the article is regretted.

Q: What is Dharm?

A:  I consider Dharma to be the way of living by promoting the wellbeing, intellect, Satya (absolute truth) Knowledge, equality, righteousness and all other benevolent qualities for the benefit of the humanity and opposing the destructive and bad qualities.

Let us see definition of Dharm as per Maharishi Swami Dayanand Saraswati:

  • “Whatever is devoid of prejudice, and displays just conduct, consists of vocal and mental truth (Satya), is as per the directive of Ishwar (God) and is in line with the teachings of the Vedas is accepted as Dharm by me and whatever is prejudiced, unjust, consisting of lies and not in line with the teachings of Vedas is considered as Adharm by me” – Taken from Maharishi Dayanand’s statement of belief.
  • “Whose appearance is to follow the instruction of God and promote unprejudiced justice for the benefit of the entire mankind, has been tested as per Pratyaksha or direct cognizance (please see Karma section of my website to get the meaning of Pratyaksha) and is in line with the teachings of the Vedas; is suitable for all humans to consider it as Dharm.”- Taken from Maharishi Dayanand’s Aryodeshyaratnamala.
  • “Ye men! Let the end of your deliberations (Mantra) be true knowledge and the good of all beings and may they be harmonious, free from dissensions and characterised by impartiality and fairness. Mantra means deliberation in which by means of mutual consultation, conversation and instruction men investigate all things, of known or unknown qualities and virtues, from God to material objects and acquire a knowledge of them…….” – Taken from Maharishi Dayanand’s Rig Ved Adi Bhashya Bhumika, Vedokt Dharm Vishaya – Rig Ved(Sukta 191, Mantra 2 of the 10th Mandal).

Maharishi Kanaad in Vaisheshik Darshan (1:2) describes Dharm as “Through which Abhudev (prosperity) and Nishrayas (highest good – Moksha) are achieved is called Dharm”.

Maharishi Jaimini in Mimansa Darshan (1/1/2) describes Dharm as “Whose knowledge is the symbol and mark of inspiration is called Dharm”.

Before we proceed further let us try and answer a question that springs in many people’s mind.

Q: What religion am I referring to?

A: What I am referring to is Dharm and not religion. We have seen the definition of Dharm above, now let us define religion.

Definition of Religion as per Oxford Dictionary is:

Human recognition of superhuman controlling power and of a personal God or gods entitled to obedience and worship, effect of such recognition on conduct or mental attitude; particular system of faith and worship”.

Comparing the definitions of Dharm and Religion, it can be seen that they are close but not the same. The word Religion is commonly used by many people to represent Dharm. However, the word Religion cannot be used to completely define Dharm, as Dharm is the unprejudiced teachings/work for the elevation of humanity and is not confined to a particular location, race, creed, colour of people etc. In fact it is for the entire humanity. Dharm is what is preached by the Rishis (please see point 4 of My Beliefs section in my website for the definition of Rishi); from Maharishi Brahma onwards to Maharishi Dayanand. There is no contradiction in the preaching of the Rishis unless we refer to the incorrect translations by scholars like Acharya Sayana, Mahidhar, Professor Max Muller, Ralph T.H. Griffith and many more likeminded people. Below is a quote by Maharishi Dayanand:

Whatever is believed in by those who are steeped in ignorance or have been led astray by sectaries is not worthy of being accepted by the wise. That faith alone is really true (Satya) and worthy of acceptance which is followed by Aptas i.e., those who are true in word, deed and thought, promote public good and are impartial and learned; but all that is discarded by such men must be considered as unworthy of belief and false”.

Now a big question springs up as:

Q: Why should we follow Dharm?

A: The answer is simple; Dharm promotes prosperity, bliss, happiness, equality etc. for the entire humanity. Dharm frees its follower from the defects of his/her soul, mind and senses; of tendency to sin by removing ill-will against all creatures and makes him/her an ardent practiser of promoting and doing well towards the entire humanity by increasing Saatvik (pure) intellect.

There are few questions that pop up in many people’s mind regarding the practice of Dharm. I will attempt to explain the answers to those below:

Q: How can we prosper without cheating; as we might not be able to earn enough money to enjoy a lavish and luxurious life?

A: Before we answer this question, let us ask ourselves what is the purpose of lavish and luxurious life? If we answer that we want to achieve happiness then we should ask ourselves whether that happiness is short term or long lasting. Definitely it is not long lasting as we humans are very competitive by nature and that gives rise to jealousy, hatred and other negative emotions causing us stress and unhappiness; while following the Dharm gives rise to positive emotions even though one might not be as wealthy. Example of positive emotion is the emotion one feels after donating or helping another person to reduce that persons suffering. Please do not get me wrong as I’m not stopping anyone from increasing their wealth. I’m only requesting people to earn/acquire wealth without harming others and without getting sucked up by the greed in other words I’m encouraging people not to succumb to improper means.

Q: It is seen that one who follows Dharm suffers a lot.

A: Maharishi Dayanand has quoted (from Gita 18:37) in the preface of the Satyarth Prakash that “whatever is conducive to the spread of enlightenment and achievement of virtue, is poison in the beginning and nectar in the end”. The opposite is true for Adharm i.e. practice of Adharm may seem like Rose petals in the beginning but always end with thorns. A good example is the lives of the slayers of humanity. They might have held on to power for some time but have ended with humiliation, disgrace and suffering. One should always practice Dharm even though one might have to face hardships. This is called Tapa.

Q: What is tapa?

A: Let us try and understand from the below:

“Water purifies the outer part of the body, righteousness purifies the mind, study and tapa(austerity) purify the soul; here, tapa means the quality of adhering to righteous conduct (Shuddh Achaaran) in spite of bearing all kinds of troubles. Knowledge……”—taken from Maharishi Dayanand’s Satyarth Prakash 3rd Samullas – Manu Smriti 5/109

“Tapa – To bear the pairs of cold, hot, enjoyment, misery etc………” ——taken from Maharishi Patanjali’s Yog Darshan 2:1

Q: The path of Dharm might cause ill-feelings for us among our relatives and friends. Is it worth following the Dharma at the expense of our relations and friendship?

A: It becomes the duty of every person to advise his/her friends and relatives to follow the path of Dharm as it is the only way towards true prosperity and happiness. However, it might happen that those friends and relatives take your suggestion/advice incorrectly and bear malice towards you irrespective of whatever/however you try to explain; then the only option that remains for you is to keep an attitude of indifference towards them without keeping antipathy or ill feelings.

Q: What are the qualities of Dharm?

A: The following are the qualities of Dharm as explained by Maharishi Dayanand and also by Manu Smriti(from Dhriti to Akrodh):ndence of senses. Detaching senses from Adharm and always attaching senses in the practice of Dharm.

  1. Ahinsa – Harmlessness – completely shunning enmity.
  2. Dhriti – Ability and strength to have patience or in simple perseverance.
  3. Kshama – The condition of being unperturbed on the occasions of condemnation or eulogy, respect or disrespect, profit or loss and other troubles.
  4. Dum – To supress the desire for wrong doings. To check the mind from the evil and set it firm in virtuous deeds, i.e. to so control it that no vicious desires rise in it.
  5.  Asteyam – abandonment of theft. Theft is acquisition of anything without permission, through fraud or betrayl of confidence, or through any means or by anti-Vedic teachings. The reverse of it is honesty.
  6. Shauch – Internal purity by avoiding attachment, aversion, partiality etc., and external purity by washing with water and rubbing the parts of the body with earth.
  7. Indriya Nigrah – Checking the senses from vice and setting them to virtue – Freedom from the dependence of senses. Detaching senses from Adharm and always attaching senses in the practice of Dharm.
  8. Dhi – The improvement of intellect by the avoidance of intoxicants or other harmful substances, evil company idleness, vanity etc. and by the use of wholesome articles, good society and yog.
  9.  Vidhya – Acquiring the accurate knowledge of all things from the earth right up to God, and applying it in life. Knowledge means that soul, mind, tongue and action (thought, word & deed) should be in consonance with each other. (We should do as we say and as we think). Contrary to this is ignorance.
  10. Satyam – Believing and practicing truth (Satya) in every thought and deed – strict devotion to veracity – i.e. our belief about a thing should be according to the real character of that thing and so our speech and deed.
  11. Akrodh – The abandonment of anger and such other evils, and imbibing peace and other qualities – Always refrain from getting angry (Manyu is an exception).

The above qualities might be better to explain further as a different topic. Hence we leave it here.

To conclude, we can say that without Dharm there is no improvement of the humanity and hence no happiness. That is the reason why everyone should follow Dharm without fear of a little bit of suffering. Every person should have the aim to further the advancement and well – being of humans. A very good suggestion is given below in the words of Maharishi Swami Dayanand Saraswati:

“There are undoubtedly many learned persons among the followers of every religion. Should they free themselves from prejudice, accept the universal truths (Satya) – that is those truths that are to be found alike in all religions and are of universal application, reject all things in which the various religions differ and treat each other lovingly, it will be greatly to the advantage of the world, for it can-not be denied that differences among the learned create bad blood among the learned masses. This leads to the multiplication of all sorts of sorrows and sufferings and destroy human happiness. This evil, which is so dear to the heart of the selfish, has hurled mankind into the deepest depths of misery. Whoever tries to do anything with the object of benefitting humanity is opposed by the selfish people and various kinds of obstacles are thrown in his way. But finding solace in the belief that ultimately truth must conquer and not error and that it is the path of rectitude alone that men of learning and piety have always trodden, true teachers never become indifferent to the promotion of public good and never give up the promulgation of truth (Satya)”—Taken from the preface of Maharishi Dayanand’s “Satyarth Prakash”

It is the duty of every human to work towards the betterment of humanity without displaying Adharm. Every human should apply reasoning in his/her life to promote humanity and not to believe in the teachings of the so called learned people who swindle common man for their own benefit. A teacher/preacher who changes the teachings towards incorrectness to please his/her listeners is a corrupted (Bhrastha) person and a parasite on the society who is up to no good for humanity.

In simple, one should always practice and treat others as he/she would like others to treat you e.g. one should not cheat others as you yourself would not appreciate being cheated.

—Pt. Prashant.